राती रुती थिति वार || पवण पाणी अगनी पाताल ||
तिसु विचि, धरती थापि रखी धरमसाल ||
तिसु विचि, जीअ जुगति के रंग || तिन के नाम अनेक अनंत ||
रातें, ऋतुएं, तिथियाँ तथा वार, हवा, पानी, आग, पाताल -- इन सब के समुदाय में परमात्मा ने धरती को धर्म अर्जित करने का स्थान बना कर स्थापित कर दिया है | इस धरती पर कई युक्तियों तथा रंगों के जीव बस्ते हैं, जिनके अनेक तथा अनगिनत ही नाम हैं |
करमी करमी होइ विचारु || सचा आपि, सचा दरबारू ||
तिथै सोहनि पंच परवाण || नदरी करमि पवै निसाणु ||
अनेक नामों वाले तथा रंगों वाले जीवों के अपने अपने किये हुये कर्मों के अनुसार प्रभु के दर पर फैंसला होता है, जिस में कोई गलती नहीं होती, क्योंकि न्याय करने वाला परमात्मा आप सच्चा है, उस का दरबार भी सच्चा है | उस दरबार में संत जन प्रत्यक्ष रूप से सुशोभित होते हैं तथा कर्पा- दृष्टि रखने वाले परमात्मा की कर्पा से उन संत-जनों को मस्तक पर बडप्पन का निशाँ चमक जाता है |
कच पकाई, ओथै पाइ || नानक, गइआ जापै जाइ ||३४||
यहाँ संसार में किसी का बड़ा या छोटा कहलवाना कोई अर्थ नहीं रखता | इनका कच्चा होना या पक्का होना परमात्मा के दर पर जा कर मालुम होता हैं | हे नानक ! परमात्मा के दर पर जाकर ही समझ आती है की असल में कौन पक्का है तथा कौन कच्चा है |३४|
भाव: जिस मनुष्य पर प्रभु की कर्पा होती है, उसको पहले यह राह समझ आती है कि मनुष्य इस धरती पर कोई खास कर्तव्य पूरा करने के लिये आया है | यहाँ जो अनेक जीव पैदा होते हैं, इन सब के अपने अपने कर्त कर्मों के अनुसार यह फैंसला होता है कि किस किस ने मनुष्य जन्म के मनोरथ को पूरा किया है | जिस कि मेहनत कबूल होती है, वे प्रभु कि हजूरी में आदर पाते हैं | यहाँ संसार में किसी का बड़ा या किसी का छोटा होना कोई अर्थ नहीं रखता |
नोट: उपयुर्क्त विचार आत्मिक मार्ग में जीव कि पहली अवस्था है, ज्यां वह अपने कर्तव्य को पहचानता है | इस आत्मिक अवस्था का नाम 'धर्म खंड' है |
भाव: जिस मनुष्य पर प्रभु की कर्पा होती है, उसको पहले यह राह समझ आती है कि मनुष्य इस धरती पर कोई खास कर्तव्य पूरा करने के लिये आया है | यहाँ जो अनेक जीव पैदा होते हैं, इन सब के अपने अपने कर्त कर्मों के अनुसार यह फैंसला होता है कि किस किस ने मनुष्य जन्म के मनोरथ को पूरा किया है | जिस कि मेहनत कबूल होती है, वे प्रभु कि हजूरी में आदर पाते हैं | यहाँ संसार में किसी का बड़ा या किसी का छोटा होना कोई अर्थ नहीं रखता |
नोट: उपयुर्क्त विचार आत्मिक मार्ग में जीव कि पहली अवस्था है, ज्यां वह अपने कर्तव्य को पहचानता है | इस आत्मिक अवस्था का नाम 'धर्म खंड' है |
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