Wednesday, 14 December 2016

कमैंट्स (आसा दी वार)

जब किसी राज्य में अकाल पड़ जाये या बाढ़ आ जाये  तो केन्द्र सरकार, दूसरे राज्य के मुख्य मंत्री तथा अधिकारी लोग अन्न, कपड़े आदि कि जरूरतें पूरी करते हैं

पर यदि कहीं  #सत्य' का अकाल पड़ जाये  तो इस आवश्यकता को वो ही मनुष्य पूरा करेगा जिसके पास पहले से ही 'सत्य' होगा।

#भुत_प्रेत कोई कोई अलग से जून नहीं है | मनुष्य के जीवन में जब सत्य पंख लगा कर उड़ जाता है,तो मनुष्य से बड़ा कोई भुत  बेताल नहीं । सत्य न होने से यह मनुष्य अपने जीवन को कोड़ जैसी बिमारी लगा बैठा है ।

गुरू ग्रन्थ साहिब में #आसा_दी_वार' नाम की वाणी में इस सच्चाई को बहुत अच्छी तरह से समझाया गया है ।

बलिहारी_गुर_आपणै.(असा दी वार 2)

#बलिहारी_गुर_आपणै..

मैं अपने गुरु ऊपर एक दिन में सौ बार बलिहार ( न्योछावर*) जाता हूँ ।

जिस गुरु ने मनुष्य से देवता बना दिया, तथा बनाते हुए क्षण-भर का समय भी नहीं लगाया।

#जे_सउ_चंदा_उगवहि..

यदि एक सौ चन्द्रमा, और हज़ारो सूरज अपनी रौशनी कर दें, तो इतना प्रकाश होने पर भी, गुरु के बिना घना अँधेरा है ।

#आसा_दी_वार
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*#Sacrifice

Sunday, 11 December 2016

अर्मत_वेले (#सूबह_के_समय)

#आसा_की_वार' का कीर्तन होता है ।
इस बाणी में गुरू नानक देव जी ने '#अकाल_पूरुख' (प्रमात्मा) और उसके 'नाम' की महिमा की है और गुरू के महत्व पर प्रकाश डाला है ।

इस बाणी में निम्न लिखे
#गुरू_उपदेश सिधांत का वर्णन है:-

1) सतगुरू  अपने उपदेशों द्वारा साधारण मनुष्य को महान तथा धर्मी बना देता है।

2) गुरू के द्वारा ही अकाल पुरुख से सांझ बनती है।

3) अकाल पुरूख का जन्म (प्रकाश) अपने आप से हुआ है ।

4) सारी सृष्टि का कर्ता-धर्ता वही है तथा सृष्टि का हर काम उसी की रज़ा (हुकूम) से होता है ।

5) प्रभू का सिमरन करने वाले लोग प्रभू जैसे हो जाते हैं, फिर वह जन्म-मरन के चक्कर मे नहीं पड़ते ।

6) प्रभू का न्याय सच्चा है, वे जीवों को किये हुए कर्मों के आधार पर फैंसला करता है ।

7) अच्छे कर्मों वालों को अपने साथ तथा बूरे कर्मों वाले को योग्य सज़ा देता है ।

8) प्रभू की सज़ी कुदरत, बेअंत त़ाकत तथा आश्चर्यजनक कौतक देख मन में झनझनाहट, हैरानगी,प्रेम तथा श्रर्द्धा के भाव उत्पन्न होते हैं ।

9) अंहकार त्याग कर प्रभू की समझ गुरू के उपदेशों पर चल कर हो सकती है ।

10) दुनिया से मिली प्रशंसा से अभिमान नहीं करना चाहिए ।

11) प्रभू ही मनुष्य का असल सहारा है, देवी-देवताओं की उसके आगे कोई मूल्य नहीं है ।

12) अंहकार, बूरे विचार, बूरे कर्म, संसारिक पदार्थों का मोह, तथा विकार धर्म की राह में रूकावट हैं ।

13) तीरथ स्नान, मुर्ति पूजा, जप-तप,रास लीला, व दिखावे के पाठ, दिखावे के पुन्य-दान, धार्मिक भेष जैसे कर्म-कांड, प्रभू प्राप्ति में कोई सहायता नहीं करते, बल्कि दूर ले जाते हैं ।

14) सेवा, संतोष, निमर्ता, सच्चाई, दया, ऊँचा-आचरण, जरूरतमंद की मदद, विकारों से बचना आदि गुण सच्चे धर्मी मनुष्य में होने चाहिए ।

15) एक धार्मिक व्यक्ति को हर समय प्रभू को याद रखना, गुरमुखों की संगत, प्रभु पर विश्वास, नेक कमाई और उसकी रज़ा मे रहना जरूरी है ।

16) मनुष्य को स्त्री से कोई भेद-भाव नहीं रखना चाहिए ।

17)  प्रभू के भगत को मिट्ठा बोलना अध्यात्मक गुणों से भरपूर, सादा जीवन तथा उसके हुकूम पर किंतु-परंतु नहीं करना चाहिए ।

Saturday, 10 December 2016

निशान साहिब

#निशान_साहिब_की_शान_रखना_जरूरी_है

काश ! हमें गुरुद्वारा साहिब जी के #निशान_साहिब' के नाम #निशान' और अधिक से अधिक 'ऊंचाई' रखने का असल उदेश्य समझ आ सके । ताकि;-

कोई मुसाफिर शरीर दूर से इस #निशान_साहिब को देख कर 'सराय व्यवस्था' से आराम पा सके ।

कोई भूखा-प्यासा शरीर दूर से ही इस #निशान_साहिब को देखकर 'लंगर व्यवस्था' इस तन की भूख मिटा सके ।

कोई बीमार शरीर दूर से ही इस #निशान_साहिब को देख कर 'चिकत्सा व्यवस्था' मुफ़्त के इलाज़ और दवाइयों से अपने शरीर के दुःख भगा सके ।

कोई निर्वस्त्र शरीर दूर से ही इस #निशान_साहिब को देख कर फ्री 'बिस्तर व्यवस्था' से सर्द और गरम हवाओं में अपना तन ढंकने को कपड़ा पा सके ।

कोई ज्ञानहीन शरीर इस दूर से ही इस #निशान_साहिब को देख कर फ्री 'शिक्षा व्यवस्था' से पारम्भिक शिक्षा पा सके ।

कोई पापी और अपराधी शरीर दूर से ही इस #निशान_साहिब को देख कर फ्री 'गुरमत कक्षा व्यवस्था' से इस गुरद्वारा साहिब में विराजमान गुरु ग्रन्थ साहिब तथा उनकी व्याख्या करती पुस्तकों से अपनी संसारिक तथा आध्यात्मिक अवस्था की शिक्षा हासिल करते हुए स्वंय तथा औरों को इस अंध विश्वासी, कर्मकांड से भरी दुनिया को अँधेरे से दूर करे व् करवा सके ।

तो क्यों न हम अपने नज़दीक के गुरद्वारा साहिब की प्रबंध व्यवस्था को #गंभीर'ता से लेते हुए अपना दस्वन्ध (10%) गुरु की असल गोलक में डालें ।

अज्ञात

Ⓜ kya khoob likha hai kisine

आगे सफर था और पीछे हमसफर था..

रूकते तो सफर छूट जाता और चलते तो हमसफर छूट जाता..



मंजिल की भी हसरत थी और उनसे भी मोहब्बत थी..


ए दिल तू ही बता,उस वक्त मैं कहाँ जाता...

मुद्दत का सफर भी था और बरसो
का हमसफर भी था

रूकते तो बिछड जाते और चलते तो बिखर जाते....


यूँ समँझ लो,

प्यास लगी थी गजब की...
मगर पानी मे जहर था...


पीते तो मर जाते और ना पीते तो भी मर जाते.




बस यही दो मसले, जिंदगीभर ना हल हुए!!!
ना नींद पूरी हुई, ना ख्वाब मुकम्मल हुए!!!



वक़्त ने कहा.....काश थोड़ा और सब्र होता!!!
सब्र ने कहा....काश थोड़ा और वक़्त होता!!!



सुबह सुबह उठना पड़ता है कमाने के लिए साहेब...।।
आराम कमाने निकलता हूँ आराम छोड़कर।।




"हुनर" सड़कों पर तमाशा करता है और "किस्मत" महलों में राज करती है!!



"शिकायते तो बहुत है तुझसे ऐ जिन्दगी,

पर चुप इसलिये हु कि, जो दिया तूने,
वो भी बहुतो को नसीब नहीं होता"..
अजीब सौदागर है ये वक़्त भी!!!!
जवानी का लालच दे के बचपन ले गया....

अब अमीरी का लालच दे के जवानी ले जाएगा. ......




लौट आता हूँ वापस घर की तरफ... हर रोज़ थका-हारा,
आज तक समझ नहीं आया की जीने के लिए काम करता हूँ या काम करने के लिए जीता हूँ।
बचपन में सबसे अधिक बार पूछा गया सवाल -
"बङे हो कर क्या बनना है ?"
जवाब अब मिला है, - "फिर से बच्चा बनना है.

“थक गया हूँ तेरी नौकरी से ऐ जिन्दगी
मुनासिब होगा मेरा हिसाब कर दे...!!”

दोस्तों से बिछड़ कर यह हकीकत खुली...

बेशक, कमीने थे पर रौनक उन्ही से थी!!

भरी जेब ने ' दुनिया ' की पहेचान करवाई और खाली जेब ने ' अपनो ' की.

जब लगे पैसा कमाने, तो समझ आया,
शौक तो मां-बाप के पैसों से पुरे होते थे,
अपने पैसों से तो सिर्फ जरूरतें पुरी होती है। ...!!!

हंसने की इच्छा ना हो...
तो भी हसना पड़ता है...
.
कोई जब पूछे कैसे हो...??
तो मजे में हूँ कहना पड़ता है...
.

ये ज़िन्दगी का रंगमंच है दोस्तों....
यहाँ हर एक को नाटक करना पड़ता है.

"माचिस की ज़रूरत यहाँ नहीं पड़ती...
यहाँ आदमी आदमी से जलता है...!!"

दुनिया के बड़े से बड़े साइंटिस्ट,
ये ढूँढ रहे है की मंगल ग्रह पर जीवन है या नहीं,

पर आदमी ये नहीं ढूँढ रहा
कि जीवन में मंगल है या नहीं।

मंदिर में फूल चढ़ा कर आए तो यह एहसास हुआ कि...

पत्थरों को मनाने में ,
फूलों का क़त्ल कर आए हम

गए थे गुनाहों की माफ़ी माँगने ....
वहाँ एक और गुनाह कर आए हम ।।

अगर दिल को छु जाये तो शेयर जरूर करे..
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Wednesday, 7 December 2016

*कुदरत बोलती है!"*


आसमां चकित हो सोच रहा,
धरती कैसे हरियाई !
धरती सोचे, आसमां में किसने चादर फैलाई !

पर्वत सोचे, समुन्द्र के बारे,
नजाने कितनी है 'गहराई' !
सागर कहता, पर्वत की,
इतनी सुंदर ऊंचाई !

चंदा बुझे, सूरज में किसने,
कैसे रौशनी पहनाई !
सूरज अचरज, पूर्ण चाँद की,
कैसे बिजुरी छाई !

जुगनू देख, सितारे सोचें,
धरती पे मेरे कितने हमभाई!
जुगनू सोचते सोच थक गये,
अपनों में किसने उडान लगाई!

वर्क्ष सोचें, हवा कैसे है लहराई!
हवा टहल टहल के चिन्तित,
वर्क्ष स्थिर रहकर, कितना सब्र है भाई!

भँवरा सोचे बार-बार,
कैसे गुलशन में रंग हज़ारे,
गुलशन पूछे भँवरे से,
तू कैसे मंडरा कर दिन गुज़ारे!

बंजर भूमि को जलन हो रही,
हरियाली की सुंदरता से !
कायल हो रही हरियाली,
बसंत की मंद मुक्ता से!

देख सरोवर, नदिया सोचें,
बहुत शांत है इसका पानी!
नदीया देख सरोवर की चिंता,
कैसे छलकती है महारानी!

कोयल सोचे,आखिर किसने,
मोर-पंख में रंग भरे!
मोर सोच रहा है बैठा,
कोयल में किसने मधुर कंठ भरे!

मर्ग अचंभित,हाथी की कितनी देह विशाल!
हाथी लिज्जित, देखता
जब मर्ग की चाल !

नाग सोचता,वन-राजा में,
कितना बल!
सिंह राजा को लगे,
कैसे लेता नागराज, जहर निग़ल!

पोक्ष सोचे, भीषण गर्मी,
जेष्ठ मास में क्यों है पड़ती!
जेष्ठ माह सोचता रहे हमेशा,
ठंड और बर्फ,मुझे क्यों न ढकती!

सावन-भादों सोच रहे हैं,
क्यों है बसंत मनमोहें !
फाल्गुन सोचता,
बादल कैसे पानी बरसावें !

सारी कुदरत एक-दूजे को,
देख-देख कर जल जातीं !
कुदरत के हर तत्व,
अपने को छोड़, दूसरे के गुण गातीं !

जिसने भी बनाई ये रचना,
उस कर्ता को नमस्कार,
कण-कण व्यापक,पूर्ण दक्ष,
उसकी कला की जै-जै कार!

*उसकी कला की जै-जै कार!*

Friday, 2 December 2016

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