Wednesday, 24 May 2017

संत की परिभाषा

संत_की_परिभाषा
                 गुरबाणी के अनुसार संत कौन है ?
हम इस विषय में विचार करने से पहले संक्षेप में सिख इतिहास के कुछ पन्ने पलटते हैं जिसमें कहीं भी गुरुओं के इलावा किसी संत, महापुरुष, या ब्रह्मज्ञानी का जिक्र नहीं मिलता । केवल भाई मर्दाना, भाई मनी सिंह, बाबा दीप सिंह, बाबा बन्दा सिंह बहादर, भाई सुखा सिंह, भाई महताब सिंह, सुबेग सिंह, जस्सा सिंह, बघेल सिंह जैसे महान सिख हुए हैं, जिन्होंने गुरु ग्रन्थ साहिब जी रूपी गुरुओं, भगतों की विचारधारा को कायम रखने के लिये ना कहीं डेरे बनाये बल्कि गुरु की शिक्षा का प्रचार करते हुए अपनी तथा अपने परिवार को हजारों सिखों सहित कुर्बानियां दी । और सभी प्रभु से जुड़े हुए थे ।
                परन्तु आजकल संत शब्द सुनकर हमारी छवि में सफेद चोला पहने, बड़ा डेरा बनाए, लंबी गाडी में घूमते, ऊँचे स्थान पर खाली बैठे और बढ़िया सा नाम जिसमे फलाने वाले और फलां नम्बर की डिग्री का जिक्र होता है, सहज ही उभर कर आती है । आज शायद पंजाब में ऐसा कोई गाँव या शहर बचा हो जहां ऐसे सन्तों, महापुरषों, ब्रह्मज्ञानियों का डेरा ना हो । जैसे जैसे इनकी संख्या बड़ रही है, वैसे वैसे नशा, अपराध, झगड़े, पतितपना भी बड़ रहा है । इन सन्तों का योगदान कुछ भी नहीं है, सिवाय कर्मकांडों को बढ़ावा देने से ।
                   गुरु जी की शिक्षा के अनुसार मनुष्य के हाथ में कुछ नहीं है । केवल और केवल एक परमात्मा ही है जो हमारी कामनाओं की पूर्ति कर सकता है । जो प्रभु को याद रखता है, जिसने उसके गुणों को पहचान लिया है, वो "संत" है ।
          भगत फरीद जी का फरमान है :-
फरीदा काले मैडे कपड़े, काला मेडा वैस ।।
गुनही भरिआ मैं फिरा, लोकु कहै दरवेसु ।।

Tuesday, 23 May 2017

मन

अपने की मानसिक वेदना हो, मसोस कर रह जाता है मन।
अपने से छोटा कोई खिन्न हो जाए, भारी पड़ जाता है मन।
अपने से छोटा  अयोग्य अव्वल हो, मारना पड़ता है मन। 
अपने में छोटा अयोग्य 'अपना' हो, हर्षित हो जाता है मन।
अपने से छोटा अशिक्षत सफल हो जाए, टटोलता है मन।
अपने घर लोटते ही पत्नी मुस्कुराए,हरा-भरा हो जाता है मन।
अपना कोई किसी बात पर धोखा दे जाए, उतर जाता है मन।
अपने सहपाठी को याद कर, अनुभूति से घर कर जाता है मन।
अपनी सहपाठिन को याद कर अनुभूति में गड़ जाता है मन।
अपना सौंदर्य किसी कि आर्कष्ट करे, आखें चुराता है मन।
अपनी विरक्ति से घ्रणा करे कोई, खट्टा-सा हो जाता है मन।
अपनी मित्र से अनुभूति जता ना सके, मन में रह जाता है मन।
अपने से गुब्बार निकाल,उद्धेग दूर कर भड़ास निकालता है मन।
अपने के प्रति दुरभावना छिपी हो, ख़ुद को चोर कहलाता है मन।
अपना कोई साहस तोड़े,दिल छोटा करे, कच्चा हो जाता है मन।
अपना कहीं मन न लगे,आसक्ति उत्पन हो, उखड़ जाता है मन।
अपनी इस पोस्ट  पर 'लाइक' ना करें, 'गंभीर'-का रह जाता है मन।

गुरद्वारा (कविता)

ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਭੇਦ ਦਰਸਾਉਂਦਾ ਹੈ,ਗੁਰੂਦੂਆਰਾ ।
ਗੁਰਬਾਣੀ ਦੀ ਸੇਧ ਦੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਵੱਲ ਲਿਜਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਗੁਰਦੁਆਰਾ ।
ਹਿਰਦੇ ਵਿੱਚ ਗਿਆਨ ਦਾ ਪ੍ਕਾਸ਼ ਭਰ ਲਾਭ ਪਹੁੰਚਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਗੁਰਦੁਆਰਾ ।
ਗੁਰਬਾਣੀ ਨੂੰ ਸੁਣਾਉਂਦਾ ਹੀ ਨਹੀਂ,ਬਲਕਿ ਆਚਰਣ ਵਿੱਚ ਉਤਰਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਗੁਰਦੁਆਰਾ ।
ਰੱਬ ਨੂੰ ਪਾਉਣ ਦਾ ਦੁਆਰ ਹੈ ਇਹ, ਕੁਝ ਪੱਲ ਬੈਠ,ਦੂਸਰਿਆਂ ਨੂੰ ਰਾਹ ਪਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਗੁਰਦੁਆਰਾ ।
Gurmeet Singh Gambhir

आंनद की अनुभूति

आंनद_की_अनुभूति

मनुष्य का नाच, गाना, मनोरंजन, सुंदरता,सोना-चांदी, बड़ा घर, बढ़िया गाड़ी, जमीन-जेहदाद,धन-सम्पदा,संसार में प्रसिद्धि आदि सभी सुख, रस, आनंद की ओर प्रभावित होना स्वभाविक है । वह अपने को इसी लोभ रूपी लालसा में उलझाए रखता है । जिससे उसके मन में इन सभी सुखों को देने वाले दातार प्रभु का नाम भुल जाता है ।
                       गुरु की शिक्षा समझाती है कि ये सभी 'रस' समय के साथ समाप्त होने वाले हैं । लेकिन प्रभु के नाम का रस जो एक 'आनंद' है, यदि एक बार मन में बस जाए जो सदैव साथ रहता है, तो जीवन में भी प्रभु के जैसे सच्चे गुण पैदा हो सकते हैं । यह गुण उन कच्चे आनंद की तरह समय परिवर्तन के साथ कम नहीं होते, बदलते नहीं और ना ही समाप्त होते हैं । इस आनंद को "गूंगे की मिठाई" की तरह केवल महसूस ही किया जा सकता है ।
               सिख इतिहास गवाह है कि इस सच्चे आनंद की अनुभूति पांचवें गुरु अर्जन देव जी को मुगलों द्वारा जून की गर्मी में तपते तवे पर बिठा कर गर्म रेत शरीर पर डाले जाना, नोवें गुरु तेग बहादर जी का सिर धड़ से अलग किया जाना, दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबजादों को दीवार में चिनवाया जाना, ऐसे ही बहुत से सिखों की कई प्रकार से तकलीफ देकर दी गई शहीदी के समय थी । यह वो सच्चा आनंद है जिसे लिखना और आपके लिये पढना तो सरल है, पर उसका स्वाद वही बता सकते हैं, जन्होंने इसे चखा है फिर भी वो कहने से असमर्थ है ।
                 गुरु ग्रन्थ साहिब जी के अनुसार हमें नाशवान पदार्थों से अधिक प्रभु के सच्चे नाम की याद रूपी आनंद की अनुभुति के अहसास के लिये अभ्यास करते रहना चाहिए । जो संसार के विकार, बुराई, कर्मकाण्ड, भर्म, दुविधा,पाखंड तथा नशे को त्याग कर एक प्रभु की याद, गुणगान से संभव है ।

Amrender Singh

नाम का जाप

#नाम_का_जाप ।    
             पिछले अध्यायों में हमें गुरु ग्रन्थ साहिब जी की शिक्षा और उसके अध्यन से प्रभु का स्वरूप, उसकी कृपा और उसके अंतर्यामी होने की जानकारी मिली । आज के विषय के मुताबिक़ प्रभु के साथ जुड़ने के तरीके #जाप" के बारे में जानेगे ।
               क्या इसके लिये समाधि लगाने, गुफा में बैठ कर तपस्या करने की आवश्यकता है ? या कोई ओर ढंग है, प्रभु से जुड़ने का ?
                   गुर जी की विचारधारा हमें इन सभी कर्मों से छुटकारा दिलाती है । गुरु साहिब तो हमें एक दूसरे से प्रेम करने, इस प्रभु के नाम व गुणों को याद रखने की शिक्षा देते हैं । इसलिये हमें गुरु की शिक्षाओं को मन में धारण कर इस प्रभु को सदैव याद रखने की बात कही हैं । प्रभु का गुणगान से तातपर्य उसकी बनाई सृष्टि और उनके नियमों से है, जिसकी वजह से हमारा जीवन  व्यापन ठीक ठाक से चल रहा है। चाहे वो प्रकर्ति के सूरज, चाँद, सितारे हों या पेड़, पहाड़, नदियां हों या प्रभु द्वारा दिया हुआ हमारा जीवन, माँ बाप, बच्चे हों ।
                      हम संसार से अपने तथा परिवार की सुख शांति के लिये धन सम्पदा, सोना चांदी, जमीन जयदाद एकत्र करते हैं वो तो कभी भी किसी और की हो सकती है, परन्तु प्रभु का नाम तथा उसके गुणगान का व्यख्यान जो हम एक दूसरे को बांटते हैं जो हमें गुरु जी की शिक्षा से मिला है, कोई छीन नहीं सकता । इससे हमारे मन में संतोष, सुख व परम् ज्ञान की प्राप्ति होती है ।
           1, प्रभु के नाम तथा उसके गुणों को याद रखने से काम, क्रोध, लोभ, मोह, व अहंकार जैसे विकार दूर होते हैं ।
            2, जो लोग प्रभु का नाम स्मरण करते है  वो अपनी मेहनत में सफल होते हैं । उनके जीवन उज्ज्वल रहते हैं, और उन के साथ संग करने वाले भी मुक्त हो जाते हैं ।
           3, प्रभु के नाम को जपना से भावार्थ हैं कि उसको सदैव याद रखना, गुरु की शिक्षा द्वारा प्रभु के गुणों को कीर्तन से गायन करना ।
           यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम नाम के जप का अर्थ गुरु की बाणी का पाठ गिनतियों में, माला लेकर करते हैं । इससे हमारा ध्यान गिनने तक ही सिमित रहता है । गुरु जी ने हमें  नाम को गिनती से नहीं, बल्कि अपने रोम रोम में बसाने की शिक्षा दी है । जिससे हमारा आचरण अच्छा तथा विकारों की मेल दूर होती है ।
        गुरु की शिक्षा हमे अपना काम करते हुए, उठते बैठते, लेटते जागते, हर समय उस प्रभु की याद करें जैसे हम अपने परिवार, कारोबार, धन पदार्थों को याद रखते हैं ।
         प्रभु को याद करने के लिये किसी स्थान, दिन, महूर्त, त्यौहार, विशेष की आवश्यकता नहीं है । यदि हम प्रभु के नाम जपने के लिये गिनती, समय महूर्त में ही उलझे रहेंगे तो अपने अंदर प्रेम, अच्छा आचरण , विकारों से दुरी नहीं नहीं बना पाएंगे । क्योंकि हमारा जो सिमित समय (जीवन) है वो लगातार समाप्त हो रहा है ।

Amrender Singh

Sikh should no do

WHAT THE SIKHS SHOULD NOT DO :
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1. He should not differentiate between his son and daughter and equality should be used always in rearing them up.

2. He should not indulge in show-business what-so-ever.
    Simple living and high thinking should be his guide words.

3. He should not grind his own axe by snatching the rights of others.He should rather regard poor man's mouth as the cash  chest (till) of the guru.

4. A Sikh shall never steal , beg or gamble.

5. A Sikh shall not disrespect his hair and always cover his
   head with turban and with Dupatta (cloth) in case of a lady.

6.A Sikh must not deviate from the path of religion and shall
observe the Sikh rules of conduct and conventions from cradle to cremation.

7.A Sikh man or woman should not enter into wedlock on the basis of caste , creed and descent of prospective spouse.It means caste or creed should not be given any consideration because Sikhs are caste-less people. Sikhs consider marriage as the union of souls , one soul two bodies.

8. A Sikh should not marry a second wife if his first wife is alive. This is against the law even.

9. A Sikh should not consider the service of humanity a mean affair, rather such service occupies prominent place in Sikh religion. Sikh entire life is a life of benevolent exertion.
          A devout Sikh Bhai Kanhyia, the real founder of modern Red Cross Movement served water to the wounded soldiers belonging to Sikh army as well as to the army of the enemy and applying healing balm to save the sufferers , provided an unmatched example of selfless service to the humanity.

Monday, 22 May 2017

Atitude

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