Tuesday, 30 January 2018

Construction matireal

Construction material:

1. Sand: रेत
2. Soil: मिट्टी
3. Mud: गीली मिट्टी
4. Rock: चट्टान, शिला
5. Stone: पत्थर
6. Gravel: बजरी
7. Pebble: चिकना और गोल पत्थर
a small stone made smooth and round by the action of water or sand.
8. Boulder: गोल चट्टान का टुकड़ा
a large rock, typically one that has been worn smooth by erosion.
9. Concrete: कंक्रीट,  जमाया हुआ रोड़ा
10. Rubble: मलबा
11. Lime: चूना
12. Brick: ईंट

Thursday, 25 January 2018

Don't wait

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तब तक इंतजार न करें जब तक कि आपको दूसरे लोगों के प्यार की जरूरत न हो, यह समझने के लिए कि आपको पहली जगह में प्यार करना चाहिए।

जब तक आप अकेले अपने दोस्तों को याद करने के लिए शुरू करने के लिए इंतजार मत करो

जब तक आप किसी पदोन्नति को कड़ी मेहनत करने के लिए शुरू करना नहीं चाहते तब तक प्रतीक्षा न करें।

तब तक इंतजार न करें जब तक कि आप यह महसूस न करें कि आपको दूसरों की सलाह लेनी चाहिए।

तब तक इंतजार न करें जब तक आप बीमार न हो जाए तो यह समझ सकें कि जीवन कितना कमजोर है।

जब तक आप रिश्ते को संतोष न करने का अफसोस करते हैं तब तक इंतजार न करें।

जब तक आप अपने आप में विश्वास करना शुरू नहीं करते, तब तक प्रतीक्षा न करें

जब तक किसी को यह पता न पड़े कि आप गलत हैं, तब तक प्रतीक्षा न करें।

गरीबों की मदद करना शुरू करने के लिए जब तक आप कल्पना से परे अमीर न हों तब तक इंतजार न करें।

उस दिन तक इंतजार न करें जब तक कि आप मरने के लिए यह जान लें कि आपको अपने जीवन से प्रेम करना चाहिए।

जीवन निरंतर उन लोगों को दंडित कर रहा है जो कुछ भी नहीं लेकिन इंतजार कर रहे हैं

इस तरह:
पोस्ट किया गया: अंग्रेजी सीखना
जनवरी 25, 2018 U-DICTIONAIEDITOR
स्थिति ...

Tuesday, 23 January 2018

Modal Verbs:

Modal Verbs:

1. Can (समर्थ होना) - ability, request

2. Could (करने योग्य होना) - past ability, suggestion, future possibility

3. May (आज्ञा पाना/संभव होना) - permission or future possibility

4. Might (हो सकना) - present or future possibility

5. Must (आवश्यक होना) - necessity or obligation

6. Ought to (करना चाहिए) - what's right and correct

7. Shall (भविष्यकाल सूचक क्रिया) - offer or suggestion

8. Should (भविष्यकाल की सहायक क्रिया) - advice or uncertain prediction

9. Will (इच्छा होना/आज्ञा देना/भविष्य सूचक) - willingness, certain prediction, or promise

10. Would (भूतकाल को प्रकट करने के लिए) - request, invitation, or making arrangements

Monday, 22 January 2018

हमारा जीवन और उसका उद्देश्य


            हमें भी सभी के साथ अपने विचारों को जोड़ना चाहिए।

           इस धरती पर आदमी को भगवान का सबसे अच्छी रचना माना गया है और यह भी माना जाता है कि इस पृथ्वी पर सभी मनुष्यों को एक उद्देश्य पूरा करने के लिए बनाया गया है और सही मायनों में हम में से कोई भी व्यर्थ रचना नहीं है। हमें विश्वास होना चाहिए कि हम सबसे अच्छी रचना हैं ।

जो हम विचार जानते हैं और जो विचार हम स्वंय बनाते हैं, वो सर्वोत्तम हैं। पाषाण युग से आज तक जो भी लिखा गया है, हम इसे पढ़ सकते हैं, लेकिन हमें अंधे भक्त  नहीं होना चाहिए, हमारे अपने विचार भी होने चाहिए। दूसरों के भक्त होने की तुलना में उनके प्रशंसक बनाना बेहतर होगा।

इतिहास में जो कुछ भी  कहा गया है, वो अतीत है।  यह जरूरी नहीं है कि वर्तमान में उन सभी परम्पराओं  का पालन करना चाहिए। इसी तरह भविष्य के लिए वर्तमान का पालन करना जरूरी नहीं होगा। यह आदमी पाषाण युग से शुरू हुआ था और आज वह पाषाण युग में नहीं है।  अब इसने आसमान में उड़ान भरना शुरू कर दिया है। पूरी दुनिया को उसके सामने एक छोटे से मोबाइल में ला खड़ा किया है। जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते थे। अगली पीढ़ी को कुछ और नया देखकर अनुभव होगा ।

हमारे पास भविष्य को नियंत्रित करने के लिए कोई भी शरीरक रूप से नहीं रहेगा। आज तक की सभी बुरी  घटनाएं उन लोगों की वजह से हैं, जो अंधे भक्त थे। इन्हीं अनुयायियों की वजह से पैदा हुई थी । वो सिर्फ अंधे अनुयायी थे।

आज और अभी से, हमें यह अवश्य समझनी चाहिए कि हम भी कुदरत की विशेष रचना हैं इसलिए, हम भी कुछ नया विचार, नया सिद्धांत स्थापित करेंगे। यह हमारा कर्तव्य होना चाहिए क्योंकि जब हम परमेश्वर की विशेष रचना हैं तो हमें इस जीवन का उद्देश्य पूरा करना चाहिए।

यदि हम मानते हैं कि भगवान के पास वापस जाकर कोई जवाबदेही  बनती है तो उन्हें बताइए कि जिस प्रयोजन के लिए उसने हमें बनाया गया हौ, हमने उस उद्देश्य को पूरा किया है और अगले आदेश का इंतजार कर रहे हैं।
 

Sunday, 31 December 2017

1st jan

Sachkand Sri #HarMander Sahib Ji Vikhy Hoiya Aj #Amrit Vele Da Pavitar #HukamNama Sahib Ji (in #ਪੰਜਾਬੀ #Hindi #English) Plz #Read n #Share  #ਅੰਗ671  #1Jan.
        *ਧਨਾਸਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥*

*ਜਿਸ ਕਾ ਤਨੁ ਮਨੁ ਧਨੁ ਸਭੁ ਤਿਸ ਕਾ ਸੋਈ ਸੁਘੜੁ ਸੁਜਾਨੀ ॥ ਤਿਨ ਹੀ ਸੁਣਿਆ ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਮੇਰਾ ਤਉ ਬਿਧਿ ਨੀਕੀ ਖਟਾਨੀ ॥੧॥*
ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਪ੍ਰਭੂ ਦਾ ਦਿੱਤਾ ਹੋਇਆ ਇਹ ਸਰੀਰ ਤੇ ਮਨ ਹੈ, ਇਹ ਸਾਰਾ ਧਨ-ਪਦਾਰਥ ਭੀ ਉਸੇ ਦਾ ਦਿੱਤਾ ਹੋਇਆ ਹੈ, ਉਹੀ ਸੁਚੱਜਾ ਹੈ ਤੇ ਸਿਆਣਾ ਹੈ। ਅਸਾਂ ਜੀਵਾਂ ਦਾ ਦੁੱਖ ਸੁਖ (ਸਦਾ) ਉਸ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੇ ਹੀ ਸੁਣਿਆ ਹੈ, (ਜਦੋਂ ਉਹ ਸਾਡੀ ਅਰਦਾਸ-ਅਰਜ਼ੋਈ ਸੁਣਦਾ ਹੈ) ਤਦੋਂ (ਸਾਡੀ) ਹਾਲਤ ਚੰਗੀ ਬਣ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ॥੧॥
*ਜੀਅ ਕੀ ਏਕੈ ਹੀ ਪਹਿ ਮਾਨੀ ॥ ਅਵਰਿ ਜਤਨ ਕਰਿ ਰਹੇ ਬਹੁਤੇਰੇ ਤਿਨ ਤਿਲੁ ਨਹੀ ਕੀਮਤਿ ਜਾਨੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥*
ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿੰਦ ਦੀ (ਅਰਦਾਸ) ਇਕ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਕੋਲ ਹੀ ਮੰਨੀ ਜਾਂਦੀ ਹੈ। (ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਆਸਰੇ ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਲੋਕ) ਹੋਰ ਬਥੇਰੇ ਜਤਨ ਕਰ ਕੇ ਥੱਕ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਉਹਨਾਂ ਜਤਨਾਂ ਦਾ ਮੁੱਲ ਇਕ ਤਿਲ ਜਿਤਨਾ ਭੀ ਨਹੀਂ ਸਮਝਿਆ ਜਾਂਦਾ ॥ ਰਹਾਉ ॥
*ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਨਿਰਮੋਲਕੁ ਹੀਰਾ ਗੁਰਿ ਦੀਨੋ ਮੰਤਾਨੀ ॥ ਡਿਗੈ ਨ ਡੋਲੈ ਦ੍ਰਿੜੁ ਕਰਿ ਰਹਿਓ ਪੂਰਨ ਹੋਇ ਤ੍ਰਿਪਤਾਨੀ ॥੨॥*
ਹੇ ਭਾਈ! ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਨਾਮ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਹੈ, ਨਾਮ ਇਕ ਐਸਾ ਹੀਰਾ ਹੈ ਜੇਹੜਾ ਕਿਸੇ ਮੁੱਲ ਤੋਂ ਨਹੀਂ ਮਿਲ ਸਕਦਾ। ਗੁਰੂ ਨੇ ਇਹ ਨਾਮ-ਮੰਤਰ (ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ) ਦੇ ਦਿੱਤਾ, ਉਹ ਮਨੁੱਖ (ਵਿਕਾਰਾਂ ਵਿਚ) ਡਿੱਗਦਾ ਨਹੀਂ, ਡੋਲਦਾ ਨਹੀਂ, ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਪੱਕੇ ਇਰਾਦੇ ਵਾਲਾ ਬਣ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਮੁਕੰਮਲ ਤੌਰ ਤੇ (ਮਾਇਆ ਵਲੋਂ) ਸੰਤੋਖੀ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ ॥੨॥
*ਓਇ ਜੁ ਬੀਚ ਹਮ ਤੁਮ ਕਛੁ ਹੋਤੇ ਤਿਨ ਕੀ ਬਾਤ ਬਿਲਾਨੀ ॥ ਅਲੰਕਾਰ ਮਿਲਿ ਥੈਲੀ ਹੋਈ ਹੈ ਤਾ ਤੇ ਕਨਿਕ ਵਖਾਨੀ ॥੩॥*
(ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਗੁਰੂ ਪਾਸੋਂ ਨਾਮ-ਹੀਰਾ ਮਿਲ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਦੇ ਅੰਦਰੋਂ) ਉਹਨਾਂ ਮੇਰ-ਤੇਰ ਵਾਲੇ ਸਾਰੇ ਵਿਤਕਰਿਆਂ ਦੀ ਗੱਲ ਮੁੱਕ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ਜੋ ਜਗਤ ਵਿਚ ਬੜੇ ਪ੍ਰਬਲ ਹਨ। (ਉਸ ਮਨੁੱਖ ਨੂੰ ਹਰ ਪਾਸੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਹੀ ਇਉਂ ਦਿੱਸਦਾ ਹੈ, ਜਿਵੇਂ) ਅਨੇਕਾਂ ਗਹਣੇ ਮਿਲ ਕੇ (ਗਾਲੇ ਜਾ ਕੇ) ਰੈਣੀ ਬਣ ਜਾਂਦੀ ਹੈ, ਤੇ, ਉਸ ਢੇਲੀ ਤੋਂ ਉਹ ਸੋਨਾ ਹੀ ਅਖਵਾਂਦੀ ਹੈ ॥੩॥
*ਪ੍ਰਗਟਿਓ ਜੋਤਿ ਸਹਜ ਸੁਖ ਸੋਭਾ ਬਾਜੇ ਅਨਹਤ ਬਾਨੀ ॥ ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਨਿਹਚਲ ਘਰੁ ਬਾਧਿਓ ਗੁਰਿ ਕੀਓ ਬੰਧਾਨੀ ॥੪॥੫॥*
(ਹੇ ਭਾਈ! ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਅੰਦਰ ਗੁਰੂ ਦੀ ਕਿਰਪਾ ਨਾਲ) ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਜੋਤਿ ਦਾ ਪਰਕਾਸ਼ ਹੋ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਦੇ ਅੰਦਰ ਆਤਮਕ ਅਡੋਲਤਾ ਦੇ ਆਨੰਦ ਪੈਦਾ ਹੋ ਜਾਂਦੇ ਹਨ, ਉਸ ਨੂੰ ਹਰ ਥਾਂ ਸੋਭਾ ਮਿਲਦੀ ਹੈ, ਉਸ ਦੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਸਿਫ਼ਤ-ਸਾਲਾਹ ਦੀ ਬਾਣੀ ਦੇ (ਮਾਨੋ) ਇਕ-ਰਸ ਵਾਜੇ ਵੱਜਦੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ। ਨਾਨਕ ਜੀ ਆਖਦੇ ਹਨ - ਗੁਰੂ ਨੇ ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਵਾਸਤੇ ਇਹ ਪ੍ਰਬੰਧ ਕਰ ਦਿੱਤਾ, ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਸਦਾ ਲਈ ਪ੍ਰਭੂ-ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ ਟਿਕਾਣਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰ ਲੈਂਦਾ ਹੈ ॥੪॥੫॥*

         *धनासरी महला ५ ॥*

*जिस का तनु मनु धनु सभु तिस का सोई सुघड़ु सुजानी ॥ तिन ही सुणिआ दुखु सुखु मेरा तउ बिधि नीकी खटानी ॥१॥ जीअ की एकै ही पहि मानी ॥ अवरि जतन करि रहे बहुतेरे तिन तिलु नही कीमति जानी ॥ रहाउ ॥ अम्रित नामु निरमोलकु हीरा गुरि दीनो मंतानी ॥ डिगै न डोलै द्रिड़ु करि रहिओ पूरन होइ त्रिपतानी ॥२॥ ओइ जु बीच हम तुम कछु होते तिन की बात बिलानी ॥ अलंकार मिलि थैली होई है ता ते कनिक वखानी ॥३॥ प्रगटिओ जोति सहज सुख सोभा बाजे अनहत बानी ॥ कहु नानक निहचल घरु बाधिओ गुरि कीओ बंधानी ॥४॥५॥*

*☬ हिंदी में अर्थ :- ☬*

*हे भाई! जिस प्रभू का दिया हुआ* *यह शरीर और मन है, यह सारा धन-पदार्थ भी उसी का दिया हुआ है, वही सुशील और स्याना है। हम जीवों का दुःख सुख (सदा) उस परमात्मा ने ही सुना है, (जब वह हमारी अरदास-अरजोई सुनता है) तभी (हमारी) हालत अच्छी बन जाती है ॥१॥ हे भाई! जिंद की (अरदास) एक परमात्मा के पास ही मानी जाती है। (परमात्मा के सहारे के बिना लोग) अन्य बहुत यत्न कर के थक जाते हैं, उन यत्नों का मुल्य एक तिल जितना भी नहीं समझा जाता ॥ रहाउ ॥ हे भाई! परमात्मा का नाम आतमिक जीवन देने वाला है, नाम एक ऐसा हीरा है जो किसी मूल्य से नहीं मिल सकता। गुरू ने यह नाम मन्त्र (जिस मनुष्य को) दे दिया, वह मनुष्य (विकारों में) गिरता नहीं, डोलता नहीं, वह मनुष्य पक्के इरादे वाला बन जाता है, वह मुकम्मल तौर पर (माया की तरफ से) संतोखी रहता है ॥२॥ (हे भाई! जिस मनुष्य को गुरू पासों नाम-हीरा मिल जाता है, उस के अंदरों) उन्हा मेर-तेर वाले सभी वितकरों की बात मुक जाती है जो जगत में बड़े पर्बल हैं। (उस मनुष्य को हर तरफ परमात्मा ही इस तरह दिखता है, जैसे) अनेकों गहनें मिल कर (गाले जा कर) रैणी बन जाती है, और, उस ढेली से वह सोना ही कहलाती है ॥३॥ (हे भाई! जिस मनुष्य के अंदर गुरू की कृपा से) परमात्मा की ज्योत का प्रकाश हो जाता है, उस के अंदर आतमिक अडोलता के आनंद पैदा हो जाते हैं, उस को हर जगह शोभा मिलती है, उस के हिरदे में सिफत-सलाह की बाणी के (मानों) एक-रस वाजे वजते रहते हैं। नानक जी कहते हैं - गुरू ने जिस मनुष्य के लिए यह प्रबंध कर दिया, वह मनुष्य सदा के लिए प्रभू-चरनों में टिकाणा प्राप्त कर लेता है ॥४॥५॥*

*Dhhanaasaree Mahalaa 5 ||*

*Jis Kaa Tan Man Dhhan Sabh Tis Kaa Soee Sugharr Sujaanee || Tin Hee Suneaa Dukh Sukh Meraa Tau Bidhh Neekee Khattaanee ||1|| Jeea Kee Ekai Hee Peh Maanee || Avar Jatan Kar Rahe Bahutere Tin Til Nahee Keemat Jaanee || Rahaau || Amrit Naam Nirmolak Heeraa Gur Deeno Mantaanee || Ddigai N Ddolai Drirr Kar Raheo Pooran Hoe Triptaanee ||2|| Oe Ju Beech Ham Tum Kashh Hote Tin Kee Baat Bilaanee || Alankaar Mil Thhailee Hoee Hai Taa Te Kanik Vakhaanee ||3|| Pragtteo Jot Sehaj Sukh Sobhaa Baaje Anhat Baanee || Kahu Naanak Nehchal Ghar Baadhheo Gur Keeo Bandhhaanee ||4||5||*

*☬ English Translation:- ☬*

*Body, mind, wealth and everything belong to Him; He alone is all-wise and all-knowing. He listens to my pains and pleasures, and then my condition improves. ||1|| My soul is satisfied with the One Lord alone. People make all sorts of other efforts, but they have no value at all. || Pause || The Ambrosial Naam, the Name of the Lord, is a priceless jewel. The Guru has given me this advice. It cannot be lost, and it cannot be shaken off; it remains steady, and I am perfectly satisfied with it. ||2|| Those things which tore me away from You, Lord, are now gone. When golden ornaments are melted down into a lump, they are still said to be gold. ||3|| The Divine Light has illuminated me, and I am filled with celestial peace and glory; the unstruck melody of the Lord's Bani resounds within me. Says Nanak Ji, I have built my eternal home; the Guru has constructed it for me. ||4||5||*

Saturday, 30 December 2017

पथ

अब तक;
एक विधि,
एक शैली,
एक सम्मान,
एक स्पष्ट रूप में शर्त या
निश्चित स्थिति की पहचान
कुछ करने का तरीका या
कुछ में एक विशेष पहलू।
काफी दूरी या हद तक;
अब तक

Monday, 25 December 2017

Sachkand Sri HarMander Sahib Ji Vikhy Hoiya Aj Amrit  Vele Da Pavitar Hukamnama Sahib JiPlz Read n Share #ਅੰਗ635 #26Dec.*
      *ਸੋਰਠਿ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੧ ਅਸਟਪਦੀਆ ਚਉਤੁਕੀ*

        *ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥*

*ਦੁਬਿਧਾ ਨ ਪੜਉ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਹੋਰੁ ਨ ਪੂਜਉ ਮੜੈ ਮਸਾਣਿ ਨ ਜਾਈ ॥ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਰਾਚਿ ਨ ਪਰ ਘਰਿ ਜਾਵਾ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਨਾਮਿ ਬੁਝਾਈ ॥ ਘਰ ਭੀਤਰਿ ਘਰੁ ਗੁਰੂ ਦਿਖਾਇਆ ਸਹਜਿ ਰਤੇ ਮਨ ਭਾਈ ॥ ਤੂ ਆਪੇ ਦਾਨਾ ਆਪੇ ਬੀਨਾ ਤੂ ਦੇਵਹਿ ਮਤਿ ਸਾਈ ॥੧॥*
ਮੈਂ ਪਰਮਾਤਮਾ ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਆਸਰੇ ਦੀ ਭਾਲ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਪੈਂਦਾ, ਮੈਂ ਪ੍ਰਭੂ ਤੋਂ ਬਿਨਾ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਨੂੰ ਨਹੀਂ ਪੂਜਦਾ, ਮੈਂ ਕਿਤੇ ਸਮਾਧਾਂ ਤੇ ਮਸਾਣਾਂ ਵਿਚ ਭੀ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦਾ । ਮਾਇਆ ਦੀ ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਵਿਚ ਫਸ ਕੇ ਮੈਂ (ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਦਰ ਤੋਂ ਬਿਨਾ) ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਘਰ ਵਿਚ ਨਹੀਂ ਜਾਂਦਾ, ਮੇਰੀ ਮਾਇਕ ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਾਮ ਨੇ ਮਿਟਾ ਦਿੱਤੀ ਹੈ । ਗੁਰੂ ਨੇ ਮੈਨੂੰ ਮੇਰੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਹੀ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਨਿਵਾਸ-ਅਸਥਾਨ ਵਿਖਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ, ਅਤੇ ਅਡੋਲ ਅਵਸਥਾ ਵਿਚ ਰੱਤੇ ਹੋਏ ਮੇਰੇ ਮਨ ਨੂੰ ਉਹ ਸਹਿਜ-ਅਵਸਥਾ ਚੰਗੀ ਲੱਗ ਰਹੀ ਹੈ । ਹੇ ਮੇਰੇ ਸਾਈਂ! (ਇਹ ਸਭ ਤੇਰੀ ਹੀ ਮੇਹਰ ਹੈ) ਤੂੰ ਆਪ ਹੀ (ਮੇਰੇ ਦਿਲ ਦੀ) ਜਾਣਨ-ਵਾਲਾ ਹੈਂ; ਆਪ ਹੀ ਪਛਾਣਨ ਵਾਲਾ ਹੈਂ, ਤੂੰ ਆਪ ਹੀ ਮੈਨੂੰ (ਚੰਗੀ) ਮਤਿ ਦੇਂਦਾ ਹੈਂ (ਜਿਸ ਕਰਕੇ ਤੇਰਾ ਦਰ ਛੱਡ ਕੇ ਹੋਰ ਪਾਸੇ ਨਹੀਂ ਭਟਕਦਾ) ।੧।
*ਮਨੁ ਬੈਰਾਗਿ ਰਤਉ ਬੈਰਾਗੀ ਸਬਦਿ ਮਨੁ ਬੇਧਿਆ ਮੇਰੀ ਮਾਈ ॥ ਅੰਤਰਿ ਜੋਤਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਬਾਣੀ ਸਾਚੇ ਸਾਹਿਬ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥*

ਹੇ ਮੇਰੀ ਮਾਂ! ਮੇਰਾ ਮਨ ਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਵਿਚ ਵਿੱਝ ਗਿਆ ਹੈ (ਪ੍ਰੋਤਾ ਗਿਆ ਹੈ । ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਨਾਲ ਮੇਰੇ ਅੰਦਰ ਪਰਮਾਤਮਾ ਤੋਂ ਵਿਛੋੜੇ ਦਾ ਅਹਿਸਾਸ ਪੈਦਾ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ) । ਉਹੀ ਮਨੁੱਖ (ਅਸਲ) ਤਿਆਗੀ ਹੈ ਜਿਸ ਦਾ ਮਨ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਬਿਰਹੋਂ-ਰੰਗ ਵਿਚ ਰੰਗਿਆ ਗਿਆ ਹੈ । ਉਸ (ਬੈਰਾਗੀ) ਦੇ ਅੰਦਰ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਜੋਤਿ ਜਗ ਪੈਂਦੀ ਹੈ, ਉਹ ਇਕ-ਰਸ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਦੀ ਬਾਣੀ ਵਿਚ (ਮਸਤ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ), ਸਦਾ ਕਾਇਮ ਰਹਿਣ ਵਾਸਤੇ ਮਾਲਕ-ਪ੍ਰਭੂ (ਦੇ ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ) ਉਸ ਦੀ ਸੁਰਤਿ ਜੁੜੀ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ ।੧।ਰਹਾਉ।
*ਅਸੰਖ ਬੈਰਾਗੀ ਕਹਹਿ ਬੈਰਾਗ ਸੋ ਬੈਰਾਗੀ ਜਿ ਖਸਮੈ ਭਾਵੈ ॥ ਹਿਰਦੈ ਸਬਦਿ ਸਦਾ ਭੈ ਰਚਿਆ ਗੁਰ ਕੀ ਕਾਰ ਕਮਾਵੈ ॥ ਏਕੋ ਚੇਤੈ ਮਨੂਆ ਨ ਡੋਲੈ ਧਾਵਤੁ ਵਰਜਿ ਰਹਾਵੈ ॥ ਸਹਜੇ ਮਾਤਾ ਸਦਾ ਰੰਗਿ ਰਾਤਾ ਸਾਚੇ ਕੇ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥੨॥*
ਅਨੇਕਾਂ ਹੀ ਵੈਰਾਗੀ ਵੈਰਾਗ ਦੀਆਂ ਗੱਲਾਂ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਪਰ ਅਸਲ ਵੈਰਾਗ ਉਹ ਹੈ ਜੋ (ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਬਿਰਹੋਂ-ਰੰਗ ਵਿਚ ਇਤਨਾ ਰੰਗਿਆ ਹੋਇਆ ਹੈ ਕਿ ਉਹ) ਖਸਮ-ਪ੍ਰਭੂ ਨੂੰ ਪਿਆਰਾ ਲੱਗਦਾ ਹੈ, ਉਹ ਗੁਰੂ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਰਾਹੀਂ ਆਪਣੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ (ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਯਾਦ ਨੂੰ ਵਸਾਂਦਾ ਹੈ ਤੇ) ਸਦਾ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਡਰ-ਅਦਬ ਵਿਚ ਮਸਤ (ਰਹਿ ਕੇ) ਗੁਰੂ ਦੀ ਦੱਸੀ ਹੋਈ ਕਾਰ ਕਰਦਾ ਹੈ । ਉਹ ਬੈਰਾਗੀ ਸਿਰਫ਼ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੂੰ ਚੇਤਦਾ ਹੈ (ਜਿਸ ਕਰਕੇ ਉਸ ਦਾ) ਮਨ (ਮਾਇਆ ਵਾਲੇ ਪਾਸੇ) ਨਹੀਂ ਡੋਲਦਾ, ਉਹ ਬੈਰਾਗੀ (ਮਾਇਆ ਵਲ) ਦੌੜਦੇ ਮਨ ਨੂੰ ਰੋਕ ਕੇ (ਪ੍ਰਭੂ-ਚਰਨਾਂ ਵਿਚ) ਜੋੜੀ ਰੱਖਦਾ ਹੈ । ਅਡੋਲ ਅਵਸਥਾ ਵਿਚ ਮਸਤ ਉਹ ਬੈਰਾਗੀ ਸਦਾ (ਪ੍ਰਭੂ ਦੇ ਨਾਮ-) ਰੰਗ ਵਿਚ ਰੰਗਿਆ ਰਹਿੰਦਾ ਹੈ, ਤੇ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਕਰਦਾ ਹੈ ।੨।
*ਮਨੂਆ ਪਉਣੁ ਬਿੰਦੁ ਸੁਖਵਾਸੀ ਨਾਮਿ ਵਸੈ ਸੁਖ ਭਾਈ ॥ ਜਿਹਬਾ ਨੇਤ੍ਰ ਸੋਤ੍ਰ ਸਚਿ ਰਾਤੇ ਜਲਿ ਬੂਝੀ ਤੁਝਹਿ ਬੁਝਾਈ ॥ ਆਸ ਨਿਰਾਸ ਰਹੈ ਬੈਰਾਗੀ ਨਿਜ ਘਰਿ ਤਾੜੀ ਲਾਈ ॥ ਭਿਖਿਆ ਨਾਮਿ ਰਜੇ ਸੰਤੋਖੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਹਜਿ ਪੀਆਈ ॥੩॥*
ਹੇ ਭਾਈ! (ਜਿਸ ਮਨੁੱਖ ਦਾ) ਚੰਚਲ ਮਨ ਰਤਾ ਭਰ ਭੀ ਆਤਮਕ ਆਨੰਦ ਵਿਚ ਨਿਵਾਸ ਦੇਣ ਵਾਲੇ ਨਾਮ ਵਿਚ ਵੱਸਦਾ ਹੈ (ਉਹ ਮਨੁੱਖ ਅਸਲ ਬੈਰਾਗੀ ਹੈ, ਤੇ ਉਹ ਬੈਰਾਗੀ) ਆਤਮਕ ਆਨੰਦ (ਮਾਣਦਾ ਹੈ) । ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਤੂੰ ਆਪ (ਉਸ ਬੈਰਾਗੀ ਨੂੰ ਜੀਵਨ ਦੇ ਸਹੀ ਰਸਤੇ ਦੀ) ਸਮਝ ਦਿੱਤੀ ਹੈ, (ਜਿਸ ਦੀ ਬਰਕਤਿ ਨਾਲ ਉਸ ਦੀ ਤ੍ਰਿਸ਼ਨਾ-) ਅੱਗ ਬੁਝ ਗਈ ਹੈ, ਤੇ ਉਸ ਦੀ ਜੀਭ ਉਸ ਦੀਆਂ ਅੱਖਾਂ (ਆਦਿਕ) ਇੰਦ੍ਰੇ ਸਦਾ-ਥਿਰ (ਹਰਿ-ਨਾਮ) ਵਿਚ ਰੰਗੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ । ਉਹ ਬੈਰਾਗੀ ਦੁਨੀਆ ਦੀਆਂ ਆਸਾਂ ਤੋਂ ਨਿਰਮੋਹ ਹੋ ਕੇ ਜੀਵਨ ਬਿਤੀਤ ਕਰਦਾ ਹੈ, ਉਹ (ਦੁਨੀਆ ਵਾਲੇ ਘਰ-ਘਾਟ ਦੀ ਅਪਣੱਤ ਛੱਡ ਕੇ) ਉਸ ਘਰ ਵਿਚ ਸੁਰਤਿ ਜੋੜੀ ਰੱਖਦਾ ਹੈ ਜੋ ਸਚ ਮੁਚ ਉਸ ਦਾ ਆਪਣਾ ਹੀ ਰਹੇਗਾ । ਅਜੇਹੇ ਬੈਰਾਗੀ (ਗੁਰੂ-ਦਰ ਤੋਂ ਮਿਲੀ) ਨਾਮ-ਭਿੱਛਿਆ ਨਾਲ ਰੱਜੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ, ਸੰਤੋਖੀ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ, (ਕਿਉਂਕਿ ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਗੁਰੂ ਨੇ) ਅਡੋਲ ਆਤਮਕ ਅਵਸਥਾ ਵਿਚ ਟਿਕਾ ਕੇ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਨਾਮ-ਰਸ ਪਿਲਾ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ।੩।
*ਦੁਬਿਧਾ ਵਿਚਿ ਬੈਰਾਗੁ ਨ ਹੋਵੀ ਜਬ ਲਗੁ ਦੂਜੀ ਰਾਈ ॥ ਸਭੁ ਜਗੁ ਤੇਰਾ ਤੂ ਏਕੋ ਦਾਤਾ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਭਾਈ ॥ ਮਨਮੁਖਿ ਜੰਤ ਦੁਖਿ ਸਦਾ ਨਿਵਾਸੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦੇ ਵਡਿਆਈ ॥ ਅਪਰ ਅਪਾਰ ਅਗੰਮ ਅਗੋਚਰ ਕਹਣੈ ਕੀਮ ਨ ਪਾਈ ॥੪॥*
ਜਦ ਤਕ (ਮਨ ਵਿਚ) ਰਤਾ ਭਰ ਭੀ ਕੋਈ ਹੋਰ ਝਾਕ ਹੈ ਕਿਸੇ ਹੋਰ ਆਸਰੇ ਦੀ ਭਾਲ ਹੈ ਤਦ ਤਕ ਬਿਰਹੋਂ-ਅਵਸਥਾ ਪੈਦਾ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦੀ । (ਪਰ ਹੇ ਪ੍ਰਭੂ! ਇਹ ਬਿਰਹੋਂ ਦੀ) ਦਾਤ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਤੂੰ ਇਕ ਆਪ ਹੀ ਹੈਂ, ਤੈਥੋਂ ਬਿਨਾ ਕੋਈ ਹੋਰ (ਇਹ ਦਾਤਿ) ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਨਹੀਂ ਹੈ, ਤੇ ਇਹ ਸਾਰਾ ਜਗਤ ਤੇਰਾ ਆਪਣਾ ਹੀ (ਰਚਿਆ ਹੋਇਆ) ਹੈ । ਆਪਣੇ ਮਨ ਦੇ ਪਿੱਛੇ ਤੁਰਨ ਵਾਲੇ ਮਨੁੱਖ ਸਦਾ ਦੁੱਖ ਵਿਚ ਟਿਕੇ ਰਹਿੰਦੇ ਹਨ, ਜੇਹੜੇ ਬੰਦੇ ਗੁਰੂ ਦੀ ਸ਼ਰਨ ਪੈਂਦੇ ਹਨ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਪ੍ਰਭੂ (ਨਾਮ ਦੀ ਦਾਤਿ ਦੇ ਕੇ) ਆਦਰ ਮਾਣ ਬਖ਼ਸ਼ਦਾ ਹੈ । ਉਸ ਬੇਅੰਤ ਅਪਹੁੰਚ ਤੇ ਅਗੋਚਰ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਕੀਮਤ (ਜੀਵਾਂ ਦੇ) ਬਿਆਨ ਕਰਨ ਨਾਲ ਨਹੀਂ ਦੱਸੀ ਜਾ ਸਕਦੀ (ਉਸਦੇ ਬਰਾਬਰ ਦਾ ਹੋਰ ਕੋਈ ਦੱਸਿਆ ਨਹੀਂ ਜਾ ਸਕਦਾ) ।੪।
*ਸੁੰਨ ਸਮਾਧਿ ਮਹਾ ਪਰਮਾਰਥੁ ਤੀਨਿ ਭਵਣ ਪਤਿ ਨਾਮੰ ॥ ਮਸਤਕਿ ਲੇਖੁ ਜੀਆ ਜਗਿ ਜੋਨੀ ਸਿਰਿ ਸਿਰਿ ਲੇਖੁ ਸਹਾਮੰ ॥ ਕਰਮ ਸੁਕਰਮ ਕਰਾਏ ਆਪੇ ਆਪੇ ਭਗਤਿ ਦ੍ਰਿੜਾਮੰ ॥ ਮਨਿ ਮੁਖਿ ਜੂਠਿ ਲਹੈ ਭੈ ਮਾਨੰ ਆਪੇ ਗਿਆਨੁ ਅਗਾਮੰ ॥੫॥*
ਪਰਮਾਤਮਾ ਇਕ ਐਸੀ ਆਤਮਕ ਅਵਸਥਾ ਦਾ ਮਾਲਕ ਹੈ ਕਿ ਉਸ ਉਤੇ ਮਾਇਆ ਦੇ ਫੁਰਨੇ ਜ਼ੋਰ ਨਹੀਂ ਪਾ ਸਕਦੇ, ਉਹ ਤਿੰਨਾਂ ਹੀ ਭਵਨਾਂ ਦਾ ਮਾਲਕ ਹੈ, ਉਸ ਦਾ ਨਾਮ ਜੀਵਾਂ ਵਾਸਤੇ ਮਹਾਨ ਉੱਚਾ ਸ੍ਰੇਸ਼ਟ ਧਨ ਹੈ । ਜਗਤ ਵਿਚ ਜਿਤਨੇ ਭੀ ਜੀਵ ਜਨਮ ਲੈਂਦੇ ਹਨ ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਮੱਥੇ ਉਤੇ (ਉਹਨਾਂ ਦੇ ਕੀਤੇ ਕਰਮਾਂ ਦੇ ਸੰਸਕਾਰਾਂ ਅਨੁਸਾਰ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਰਜ਼ਾ ਵਿਚ ਹੀ) ਲੇਖ (ਲਿਖਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਹਰੇਕ ਜੀਵ ਨੂੰ) ਆਪੋ ਆਪਣੇ ਸਿਰ ਉਤੇ ਲਿਖਿਆ ਲੇਖ ਸਹਿਣਾ ਪੈਂਦਾ ਹੈ । ਪਰਮਾਤਮਾ ਆਪ ਹੀ (ਸਾਧਾਰਨ) ਕੰਮ ਤੇ ਚੰਗੇ ਕੰਮ (ਜੀਵਾਂ ਪਾਸੋਂ) ਕਰਾਂਦਾ ਹੈ, ਆਪ ਹੀ (ਜੀਵਾਂ ਦੇ ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਆਪਣੀ) ਭਗਤੀ ਦ੍ਰਿੜ੍ਹ ਕਰਦਾ ਹੈ । ਅਪਹੁੰਚ ਪ੍ਰਭੂ ਆਪ ਹੀ (ਜੀਵਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੀ) ਡੂੰਘੀ ਸਾਂਝ ਬਖਸ਼ਦਾ ਹੈ । (ਸੱਚਾ ਵੈਰਾਗੀ) ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਡਰ-ਅਦਬ ਵਿਚ ਗਿੱਝ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਦੇ ਮਨ ਵਿਚ ਤੇ ਮੂੰਹ ਵਿਚ (ਪਹਿਲਾਂ ਜੋ ਭੀ ਵਿਕਾਰਾਂ ਦੀ ਨਿੰਦਾ ਆਦਿਕ ਦੀ) ਮੈਲ (ਹੁੰਦੀ ਹੈ ਉਹ) ਦੂਰ ਹੋ ਜਾਂਦੀ ਹੈ ।੫।
*ਜਿਨ ਚਾਖਿਆ ਸੇਈ ਸਾਦੁ ਜਾਣਨਿ ਜਿਉ ਗੁੰਗੇ ਮਿਠਿਆਈ ॥ ਅਕਥੈ ਕਾ ਕਿਆ ਕਥੀਐ ਭਾਈ ਚਾਲਉ ਸਦਾ ਰਜਾਈ ॥ ਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਮੇਲੇ ਤਾ ਮਤਿ ਹੋਵੈ ਨਿਗੁਰੇ ਮਤਿ ਨ ਕਾਈ ॥ ਜਿਉ ਚਲਾਏ ਤਿਉ ਚਾਲਹ ਭਾਈ ਹੋਰ ਕਿਆ ਕੋ ਕਰੇ ਚਤੁਰਾਈ ॥੬॥*

ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਮਨੁੱਖ ਨੇ (ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਨਾਮ ਦਾ ਰਸ) ਚੱਖਿਆ ਹੈ, (ਉਸ ਦਾ) ਸੁਆਦ ਉਹੀ ਜਾਣਦੇ ਹਨ (ਦੱਸ ਨਹੀਂ ਸਕਦੇ), ਜਿਵੇਂ ਗੁੰਗੇ ਮਨੁੱਖ ਦੀ ਖਾਧੀ ਮਿਠਿਆਈ (ਦਾ ਸੁਆਦ ਗੁੰਗਾ ਆਪ ਹੀ ਜਾਣਦਾ ਹੈ, ਕਿਸੇ ਨੂੰ ਦੱਸ ਨਹੀਂ ਸਕਦਾ) । ਹੇ ਭਾਈ! ਨਾਮ-ਰਸ ਹੈ ਹੀ ਅਕੱਥ, ਬਿਆਨ ਕੀਤਾ ਹੀ ਨਹੀਂ ਜਾ ਸਕਦਾ । (ਮੈਂ ਤਾਂ ਸਦਾ ਇਹੀ ਤਾਂਘ ਰੱਖਦਾ ਹਾਂ ਕਿ) ਮੈਂ ਉਸ ਮਾਲਕ-ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਰਜ਼ਾ ਵਿਚ ਤੁਰਾਂ । (ਪਰ ਰਜ਼ਾ ਵਿਚ ਤੁਰਨ ਦੀ) ਸੂਝ ਭੀ ਤਦੋਂ ਹੀ ਆਉਂਦੀ ਹੈ ਜੇ ਗੁਰੂ ਉਸ ਦਾਤਾਰ-ਪ੍ਰਭੂ ਨਾਲ ਮਿਲਾ ਦੇਵੇ । ਜੇਹੜਾ ਬੰਦਾ ਗੁਰੂ ਦੀ ਸ਼ਰਨ ਨਹੀਂ ਪਿਆ, ਉਸ ਨੂੰ ਇਹ ਸਮਝ ਰਤਾ ਭੀ ਨਹੀਂ ਆਉਂਦੀ । ਹੇ ਭਾਈ! ਕੋਈ ਆਦਮੀ ਆਪਣੀ ਸਿਆਣਪ ਦਾ ਮਾਣ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦਾ, ਜਿਵੇਂ ਜਿਵੇਂ ਪਰਮਾਤਮਾ ਸਾਨੂੰ ਜੀਵਾਂ ਨੂੰ (ਜੀਵਨ-ਰਾਹ ਉਤੇ) ਤੋਰਦਾ ਹੈ ਤਿਵੇਂ ਤਿਵੇਂ ਹੀ ਅਸੀ ਤੁਰਦੇ ਹਾਂ ।੬।
*ਇਕਿ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਏ ਇਕਿ ਭਗਤੀ ਰਾਤੇ ਤੇਰਾ ਖੇਲੁ ਅਪਾਰਾ ॥ ਜਿਤੁ ਤੁਧੁ ਲਾਏ ਤੇਹਾ ਫਲੁ ਪਾਇਆ ਤੂ ਹੁਕਮਿ ਚਲਾਵਣਹਾਰਾ ॥ ਸੇਵਾ ਕਰੀ ਜੇ ਕਿਛੁ ਹੋਵੈ ਅਪਣਾ ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਤੁਮਾਰਾ ॥ ਸਤਿਗੁਰਿ ਮਿਲਿਐ ਕਿਰਪਾ ਕੀਨੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਅਧਾਰਾ ॥੭॥*
ਹੇ ਅਪਾਰ ਪ੍ਰਭੂ! ਅਨੇਕਾਂ ਜੀਵ ਭਟਕਣਾ ਵਿਚ (ਪਾ ਕੇ) ਕੁਰਾਹੇ ਪਾਏ ਹੋਏ ਹਨ, ਅਨੇਕਾਂ ਜੀਵ ਤੇਰੀ ਭਗਤੀ (ਦੇ ਰੰਗ) ਵਿਚ ਰੰਗੇ ਹੋਏ ਹਨ—ਇਹ (ਸਭ) ਤੇਰਾ ਖੇਲ (ਰਚਿਆ ਹੋਇਆ) ਹੈ । ਜਿਸ ਪਾਸੇ ਤੂੰ ਜੀਵਾਂ ਨੂੰ ਲਾਇਆ ਹੋਇਆ ਹੈ ਉਹੋ ਜਿਹਾ ਫਲ ਜੀਵ ਭੋਗ ਰਹੇ ਹਨ । ਤੂੰ (ਸਭ ਜੀਵਾਂ ਨੂੰ) ਆਪਣੇ ਹੁਕਮ ਵਿਚ ਚਲਾਣ ਦੇ ਸਮਰੱਥ ਹੈਂ । (ਮੇਰੇ ਪਾਸ) ਜੇ ਕੋਈ ਚੀਜ਼ ਮੇਰੀ ਆਪਣੀ ਹੋਵੇ ਤਾਂ (ਮੈਂ ਇਹ ਆਖਣ ਦਾ ਫ਼ਖਰ ਕਰ ਸਕਾਂ ਕਿ) ਮੈਂ ਤੇਰੀ ਸੇਵਾ ਕਰ ਰਿਹਾ ਹਾਂ, ਪਰ ਮੇਰੀ ਇਹ ਜਿੰਦ ਤੇਰੀ ਹੀ ਦਿੱਤੀ ਹੋਈ ਹੈ ਤੇ ਮੇਰਾ ਸਰੀਰ ਭੀ ਤੇਰਾ ਹੀ ਦਿੱਤਾ ਹੋਇਆ ਹੈ । ਜੇ ਗੁਰੂ ਮਿਲ ਪਏ ਤਾਂ ਉਹ ਕਿਰਪਾ ਕਰਦਾ ਹੈ ਤੇ ਆਤਮਕ ਜੀਵਨ ਦੇਣ ਵਾਲਾ ਤੇਰਾ ਨਾਮ ਮੈਨੂੰ (ਜ਼ਿੰਦਗੀ ਦਾ) ਆਸਰਾ ਦੇਂਦਾ ਹੈ ।੭।
*ਗਗਨੰਤਰਿ ਵਾਸਿਆ ਗੁਣ ਪਰਗਾਸਿਆ ਗੁਣ ਮਹਿ ਗਿਆਨ ਧਿਆਨੰ ॥ ਨਾਮੁ ਮਨਿ ਭਾਵੈ ਕਹੈ ਕਹਾਵੈ ਤਤੋ ਤਤੁ ਵਖਾਨੰ ॥ ਸਬਦੁ ਗੁਰ ਪੀਰਾ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰਾ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਜਗੁ ਬਉਰਾਨੰ ॥ ਪੂਰਾ ਬੈਰਾਗੀ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਗੀ ਸਚੁ ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਮਾਨੰ ॥੮॥੧॥*
ਹੇ ਨਾਨਕ! ਜੋ ਮਨੁੱਖ ਸਦਾ ਉੱਚੇ ਆਤਮਕ ਮੰਡਲ ਵਿਚ ਵੱਸਦਾ ਹੈ (ਸੁਰਤਿ ਟਿਕਾਈ ਰੱਖਦਾ ਹੈ) ਉਸ ਦੇ ਅੰਦਰ ਆਤਮਕ ਗੁਣ ਪਰਗਟ ਹੁੰਦੇ ਹਨ, ਆਤਮਕ ਗੁਣਾਂ ਨਾਲ ਉਹ ਡੂੰਘੀ ਸਾਂਝ ਪਾਈ ਰੱਖਦਾ ਹੈ, ਆਤਮਕ ਗੁਣਾਂ ਵਿਚ ਹੀ ਉਸ ਦੀ ਸੁਰਤਿ ਜੁੜੀ ਰਹਿੰਦੀ ਹੈ (ਉਹੀ ਮਨੁੱਖ ਪੂਰਨ ਤਿਆਗੀ ਹੈ) । ਉਸ ਦੇ ਮਨ ਨੂੰ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਨਾਮ ਪਿਆਰਾ ਲੱਗਦਾ ਹੈ, ਉਹ (ਆਪ ਨਾਮ) ਸਿਮਰਦਾ ਹੈ (ਹੋਰਨਾਂ ਨੂੰ ਸਿਮਰਨ ਲਈ) ਪ੍ਰੇਰਦਾ ਹੈ । ਉਹ ਸਦਾ ਜਗਤ-ਮੂਲ ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਹੀ ਸਿਫ਼ਤਿ-ਸਾਲਾਹ ਕਰਦਾ ਹੈ । ਗੁਰੂ ਪੀਰ ਦੇ ਸ਼ਬਦ ਨੂੰ (ਹਿਰਦੇ ਵਿਚ ਟਿਕਾ ਕੇ) ਉਹ ਡੂੰਘੇ ਜਿਗਰੇ ਵਾਲਾ ਬਣ ਜਾਂਦਾ ਹੈ । ਪਰ ਗੁਰ-ਸ਼ਬਦ ਤੋਂ ਖੁੰਝ ਕੇ ਜਗਤ (ਮਾਇਆ ਦੇ ਮੋਹ ਵਿਚ) ਕਮਲਾ (ਹੋਇਆ ਫਿਰਦਾ) ਹੈ । ਉਹ ਪੂਰਨ ਤਿਆਗੀ ਮਨੁੱਖ ਅਡੋਲ ਆਤਮਕ ਅਵਸਥਾ ਵਿਚ ਟਿਕ ਕੇ ਚੰਗੇ ਭਾਗਾਂ ਵਾਲਾ ਬਣ ਜਾਂਦਾ ਹੈ, ਉਸ ਦਾ ਮਨ ਸਦਾ-ਥਿਰ ਰਹਿਣ ਵਾਲੇ ਪ੍ਰਭੂ (ਦੀ ਯਾਦ ਨੂੰ ਹੀ ਆਪਣਾ ਜੀਵਨ-ਨਿਸ਼ਾਨਾ) ਮੰਨਦਾ ਹੈ ।੮।੧।