Monday, 6 August 2012

भुजंग प्रयात छंद।।जापु साहिब।९९-१०२।

न सत्रै।। न मित्रै।।..........!
हे प्रभु ! न तेरा कोई शत्रु है, न मित्र, कि्योंकि तेरी समानता वाला कोई नहीं है; न तुझे कोई भर्म है, न तेरे अन्दर कोई दुविधा।।९९।
हे प्रभू ! न तू कर्मों के अधीन है, न ही कर्मों के कारण तुझे शरीर धारण करना पड़ता है।
हे प्रभु ! तू जन्म के चक्र में नहीं पड़ता, तू स्त्री से पैदा नहीं हुआ।१००।
न चित्रै।। मित्रै।।...........!
हे प्रभु ! तेरा कोई चित्र नहीं बना सकता, तेरा कोई मित्र नहीं कियोंकि तेरे बराबर का कोई नहीं, तू सब जीवों से परे है भाव, निर्लेप है तथा शुद्ध पवित्र आत्मा है।१०१।
हे प्रभु ! तू पृथ्वी का स्वामी है, आदि काल से स्वामी है, तथा कभी कमज़ोर न होने वाला है।१०२।

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