Wednesday, 31 May 2017

Hindi songs

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*I'm sending you thousands of Hindi songs and Ghazals with Videos & Lyrics.* *Just click on the> singer of your choice, then click on the song you want to listen, and enjoy.*

*Lata Mangeshkar (3206)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/lata_mangeshkar.php>

*Mohammad Rafi (2019)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/mohammad_rafi.php>

*Asha Bhosle (1624)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/asha_bhosle.php>

*Kishore Kumar (1431)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/kishore_kumar.php>

*Alka Yagnik (1228)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/alka_yagnik.php>

*Udit Narayan (947)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/udit_narayan.php>

*Mukesh (880)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/mukesh.php>

*Kumar Sanu (800)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/kumar_sanu.php>

*Sonu Nigam (714)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/sonu_nigam.php>

*Sunidhi Chauhan (524)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/sunidhi_chauhan.php>

*Anuradha Paudwal (480)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/anuradha_paudwal.php>

*Talat Mahmood (451)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/talat_mahmood.php>

*Shaan (352)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/shaan.php>

*Kavita Krishnamurthy (304)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/kavita_krishnamurthy.php>

*Abhijeet (295)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/abhijeet.php>

*Manna De (269)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/manna_de.php>

*Shreya Ghoshal (235)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/shreya_ghoshal.php>

*Suraiya (226)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/suraiya.php>

*Sadhana Sargam (220)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/sadhana_sargam.php>

*Ghulam Ali (209)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/ghulam_ali.php>

*Sukhwinder Singh (204)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/sukhwinder_singh.php>

*Geeta Dutt (203)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/geeta_dutt.php>

*Hemant Kumar (199)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/hemant_kumar.php>

*Mahendra Kapoor (179)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/mahendra_kapoor.php>

*Shankar Mahadevan (164)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/shankar_mahadevan.php>

*Shamshad Begum (163)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/shamshad_begum.php>

*Suresh Wadkar (158)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/suresh_wadkar.php>

*Amit Kumar (155)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/amit_kumar.php>

*Hariharan (148)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/hariharan.php>

*Kunal Ganjawala (144)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/kunal_ganjawala.php>

*Pankaj Udhas (144)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/pankaj_udhas.php>

*Jagjit Singh (141)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/jagjit_singh.php>

*K. K. (129)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/k_k.php>

*Vinod Rathod (129)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/vinod_rathod.php>

*S P Balasubramaniam(119)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/s_p_balasubramaniam.php>

*Suman Kalyanpur (104)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/suman_kalyanpur.php>

*Adnan Sami (98)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/adnan_sami.php>

*Mohammed Aziz (91)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/mohammed_aziz.php>

*Himesh Reshammiya (86)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/himesh_reshammiya.php>

*Alisha Chinai (83)* <http://www.hindigeetmala.net/singer/alisha_chinai.php>

*Pl forward to all those who love or like listening to Hindi songs...*🎵🎵🎵  Enjoy...🎵🎵🎵

Tuesday, 30 May 2017

दस्वन्ध (way to Dunate)

*दसवन्ध के_प्रकार   (Ways To Donate)*

*सिख धर्म में गुरु जी की शिक्षाओं में से "दसवन्ध" को एक "सेवा" रूपी प्रेरणा स्रोत्र माना गया है।*

*दसवन्ध" यानि अपनी आमदनी का दस प्रतिशत वो अमाउंट जो आपके जरूरी खर्चे निकाल कर बची आमदनी में से "सेव मनी" कहलाता है।*

*दसवन्ध का अभिप्राय केवल यह नहीं कि आपकी तनखाह या व्यापार से निकली अमाउंट की बचत से हो ।*

*दसवन्ध का मतलब केवल यह भी नहीं कि किसी भूखे को खाना खिलाना, कपड़े लते की जरूरत पूरी करना या रहने के लिये शैल्टर की व्यबस्था करना है ।*

*दसवन्ध आप अपनी ली हुई शिक्षा, योग्यता, तजुर्बा, आपके द्वारा की जा रही नौकरी, पेशा या व्यापर अथवा रिटायर्ड लाइफ से भी कर सकते हैं।*

*यदि आप शिक्षक हैं तो किसी दूसरे गरीब होनहार बच्चे की फ्री शिक्षा, स्कुल कालेज में दाखिला तथा फ़ीस वगैरह की जरूरत को भी "दसवन्ध" कहा जा सकता है ।*

*यदि आप डॉक्टर हैं तो किसी दूसरे गरीब और बीमार व्यक्ति के फ्री इलाज़,आपरेशन तथा दवाइयों की व्यवस्था की या करवाया जाना भी "दसवन्ध" है ।*

*यदि आप पढ़े-लिखे और लेखनी के धनी हैं तो अपने विषय के मुताबिक़ अलग अलग श्रेणी के बच्चों, जवान तथा बूढ़ों को अपने ज्ञान से अच्छी समाजिक व् धार्मिक शिक्षा की जानकारी अवगत करवाई जा सकती है । बतौर "दसवन्ध"।*

*यदि आप किसी हुनर (तकनीक) के जानकार हैं तो किसी गरीब परिवार के बच्चे को निर्भर बनाना भी "दसवन्ध" है ।*

*यदि आप रिटायर्ड व्यक्ति है तो अपनी शिक्षा से अनाथ व् गरीब बच्चों को ट्यूशन वगैरह की मदद कर सकते हैं। या किसी दूसरे बुजुर्ग असहाय का किसी पकार का मदद वो चाहे, मुहैय्या करवा देना भी "दसवन्ध" है ।*

*यदि आपका व्यापार अच्छा ख़ासा है तो किसी गरीब व् बेरोजगार व्यक्ति को रोजगार देने की व्यवस्था करना या कराना भी "दसवन्ध है ।*

*ऐसे ही बहुत से फिल्ड हैं, जिनकी आप योग्यता व् तजुर्बा रखते हैं, बिना किसी अमाउंट को खर्च किये या लिए बतौर "दसवन्ध" मदद कर सकते है ।*

*GambhirSays*

Monday, 29 May 2017

इतिहास या मिथ्यास

अधिक दूर मत जाओ, सही मायनों में पिछले पांच -छह सदियों के हमारे देश,धर्म के इतिहास को तब और अब के शासकों ने अपने स्वार्थहित, बहुत ही तोड़ -मरोड़ कर पेश किया है।

वो जालसाज़ शासक चाहे मुगल राज़ का हो, ब्रिटिश राज का हो  या आज़ाद देश के विभिन्न राजनीतिक दल,अथवा धर्म के स्वंयम्भू संत व संघ बिरादरी,जिन्होंने ऐसा जानबूझ कर किया या लेखकों को प्रलोभन देकर करवाया।

वो अब की तथा आने वाली शिक्षित पीढ़ी, हमारे देश-धर्म के महापुरषों, शहीदों, समाज सेवियों के कथन और कर्म की गाथा, वैज्ञानिक व आधुनिक उपकरणों से शोध कर, तथा अपनी बौद्धिक कार्य कुशलता से सच सामने लाने में अधिक देर नहीं लगाएगी।

#Seriously

मन की मैल और तीर्थ स्थान

मन_की_मैल_और_तीर्थ_स्नान
                  
जैसे हमने समय, दिन, महूर्त आदि को गुरबाणी अनुसार समझने की कोशिश की । वैसे ही तीर्थ स्थान, तीर्थ स्नान भी धार्मिक कर्मकाण्ड का एक विभन्न अंग है । और आमतौर पर हमारी यह धारणा बनी हुई है कि इन स्थानों की यात्रा तथा इन स्थानों के नजदीक बहने वाली नदियों या सरोवरों में स्नान करने से मन की मैल यानि अवगुण, बुराइयां, बुरी आदतें, झूठ बोलना, चुगली करना, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि सब साफ़ हो जाती है ।
                  
वैसे मैल का अभिप्राय शरीर के ऊपर धूल-मिट्टी, धुंए आदि प्रदूषण का जम जाना, जिसे साबुन के द्वारा स्नान करने पर बहुत आसानी से साफ़ किया जाता है । पर इससे हमारे अंदर के पाप , विकार का धुलना एक प्रश्न को उठाता है कि यह कैसे हो सकता है ? चलो ! गुरु ग्रन्थ साहिब जी की विचार धारा का अध्यन करते हैं ।
              
हम पहले विचार कर चुके हैं कि प्रभु हमारे अंदर ही निवास करता है । तथा लाभ, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि जो विकार हैं, वे हमारे मन की मैल हैं । हम इन अवगुणों के कारण जीवन में आए दुख सहन नही कर पाते, तथा इनसे बचने के लिए किसी के कहने पर अज्ञानता वश ये सोच बैठते हैं कि  जैसे शरीर की ऊपरी मैल स्नान से उतरती है,वैसे ही बुराइयों की मैल भी धार्मिक स्थानों की नदियों और सरोवरों के पानी से धूल जाएगी ।
                
गुरबाणी हमें विज्ञान की तरह यह समझाती है कि चाहे जितने तीर्थ स्थानों पर स्नान कर लो,परन्तु मन की मैल इससे उतरने वाली नहीं है ।
"मनि मैले सभु किछु मैला,
तनि धोतै मनु हछा न होइ ।।"
"देही धोई न उतरै मैल ।।
                 
मन की मैल को कैसे उतारना है, इससे पहले यह समझना बहुत जरुरी है कि मन की मेल पैदा कैसे होती है । यह हमारे आस पास के माहौल से जैसे, जब बच्चा जन्म लेता है। वह विकारों, कपट व अवगुण से रहित होता है । हम स्वंय उस के सामने झूठ बोलकर, उसकी गलत संगत से दोस्ती को अनदेखा कर पैदा करवाते हैं।  लेकिन हम इस मैल को गुरु की शिक्षा और प्रभु की याद से धो सकते हैं । इन संस्कारों के पैदा होने से जिंदगी भर अवगुण नज़र नहीं आते हैं ।
"मनमुख मैल न उतरै, जिचरु गुर सबदि न करै पिआरु ।।
             
जब मन में दया,धर्म,संतोष,प्रेम आदि गुण पैदा हो जाएंगे तो विकारों की मैल अपने आप उत्तर जाएगी और मन छोटे बच्चे जैसा निर्मल तथा पवित्र हो जाएगा ।
Amrender Singh
Email. sikhikalaajkal@gmail.com
Gurmeet Singh Gambhir

मौत क्या है?

मौत_क्या_है ?

मृत्यु के डर से बचने अथवा निवारण का शायद सर्वोत्तम उपाय इस बात पर विचार करने में है कि:--

जीवन की एक शुरुआत होती है, तो फिर एक अंत भी होता है।

एक समय था जब हम नहीं थे: उससे हमे कोई मतलब या जानना नहीं होता। तो फिर हमें इस बात की क्यों तकलीफ होती है कि ऐसा समय भी आएगा जब हम नहीं होंगे!

मृत्यु के बाद सब कुछ वैसा ही होता है जैसा हमारे जन्म से पहले था।

#Seriously

जाति-पात

जाति_पात ।
               क्योंकि सारे ब्राह्मण्ड की अभी हमें जानकारी नहीं है, हाँ, इस संसार के सभी जीव, पेड़, पंछी,नदी, झील, फूल, सूर्य, चाँद आदि की रचना प्रभु ने की है। जिनमें मनुष्य जाति प्रमुख है । इस जाति में जन्म लेने की प्रकिर्या, सभी को दो हाथ, पाँव, आँखें, कान दिए गए हैं । इसी के साथ प्रभु ने सूर्य तथा चाँद की रौशनी, दिन रात का समय, हवा पानी की शीतलता, आग की गर्मी और यहां तक की चलने, देखने, सुनने, बोलने का तरीका भी एक ही प्रकार का है ।
                    बादल की वर्षा, सूर्य की किरणें, ऋतुएँ सभी गावों, शहरों, पहाड़ों सभी पर एक समान पड़ती हैं ।। पर क्यों हम मनुष्य जाति को को अलग अलग वर्ग, उंच नीच, बड़ा छोटा, धर्म कर्म, श्वेत अश्वेत में बाँटा गया है ?
                       चलो, आज फिर से गुरु ग्रन्थ साहिब में लिखी बाणी और गुरु इतिहास में से दी गई शिक्षाओं की व्याख्या करके इन सवालों का उत्तर ढूंढते हैं ।
गुरु साहिबानों ने प्रभु की इच्छा के मुताबिक़ इन अंतर और भेदभाव का खण्डन अपने जीवन के बहुत से उदाहरण तथा बाणी की शिक्षाओं से किया है ।  जैसे
        जाति का गरबु न करि मूरख गवारा ।।
           इसु गरब ते चलहि बहुतु विकारा ।।
                एक नूर ते सभु जगु उपजिआ,
                   कउन भले को मंदे ।।
         सा जाति सा पति है जेहे करम कमाइ ।।                        जाति का गरबु न करिअहू कोई ।।
             बिन नावै सभ नीच जाति है,
                   बिस्टा का कीड़ा होइ ।।

              गुरु जी ने लंगर प्रथा और अमृत पान की की शुरुवात की ताकि कोई भी किसी जाति, धर्म, समाज, देश प्रदेश, अमीर गरीब आदमी इन सब मतभेद, भेदभाव, छुआछूत को भूल कर, गुरु की शिक्षा को अपनाकर, अमृत पान की रस्म स्वंय इच्छा से अपनाकर, एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन (लंगर) कर सकता है । ताकि वो अपना वर्ग सामान्य कर सके।

Sikhkalaajkal@Gmail.com

स्त्री और व्रत

#स्त्री_और_व्रत
                   गुरु नानक जी के आगमन से पहले हमारा समाज विभन्न जातियों में बंटा हुआ था। छोटी जाति के लोगों पर सेवकों जैसा व्यवहार किया जाता था । ऐसा ही हाल स्त्री का भी था । उन्हें भी सेवक, दासी और उपभोग की वस्तु से जाना जाता था । छोटी जाति और स्त्री वर्ग को शिक्षा से भी दूर रखा जाता था । स्त्री, पुरानी प्रथा के अनुसार पैदा होते ही अपना बचपन पिता, शादी के बाद अपने पति के अधीन तथा पति मृतु के बाद मृतक शरीर के साथ जिन्दा जला देने की मजबूरी पर  निर्भर रहती थी । स्त्री का कोई अपना वज़ूद, आजादी और इच्छाएं नहीं थी । क्योंकि समाज पुरुष प्रधान था । पर्दे में रहना,सती प्रथा, व्रत रखना, बाल विवाह तथा बिना धर्मिक शिक्षा और गुलामों सा जीवन ही उनकी रोजमर्या की किर्या थी ।
                 स्त्री समाज की इस भयानक दशा के प्रति गुरु नानक देव जी ने पहली बार आवाज उठाई तथा उन्हें पुरुष से भी बड़ा दर्जा दिया ।  गुरु जी ने अपनी बाणी से समझाया की यह बड़े बड़े राजाओं, सन्तों तथा महापुरुषों की जन्म दाता है । इसे नीच जाति कैसे कहा जा सकता है ।
  सो किउ मंदा आखीऐ, जितु जमिह राजान ।।

                  गुरु ग्रन्थ साहिब में स्त्री के बराबर होंने की बात कही है तथा पाखंडों, अंधविश्वासों, व्रतों आदि को भी करने से रोका है ।  विभन्न प्रकार के व्रत जिनमें सारा दिन भूखे प्यासे रहना (करवा चौथ) अधिक प्रचलित है। जिसको रखने से पति की उम्र लंबी होना बताया जाता है, को पाखण्ड कहा गया है  ।
       अनु न खाहि देही दुखु दीजै ।।
       बिन गुर गिआन त्रिपति नही थीजै ।।

       छोडहि अनु करहि पाखंड ।।
       ना सोहागनि न ओहि रंड ।।

           जिस किसी ने गुरु जी की शिक्षा को समझा है उसमें कइयों ने सिख इतिहास में अपनी  दिलेरी और हिम्मत के साथ साबित करके दिखाया है कि वो गुरु जी द्वारा दिए गए पांच ककारों, जिनमें कृपाण प्रमुख है, में लैस होकर पुरुषों की बराबरी में रहकर अपनी तथा दूसरे कमजोर व गरीब की रक्षा के लिये, शेरनी बनकर मुकाबला कर सकती हैं ।
             गुरु जी की स्त्रियों को प्रेरणा है कि यदि व्रत रखना है तो अवगुण व बुराई छोड़ने का रखो । यदि त्याग करना है तो विकारों व अंध विशवास का करो ।
सिखी, कल आज और कल
Amrender Singh Gurmeet Singh Gambhir

Sunday, 28 May 2017

सोशल मीडिया एक प्लेटफार्म है

सोशल मीडिया एक ऐसा प्लेटफॉर्म है, यदि व्यक्तिगत परिचितों को अलग रखें, तो लगता है कि हम उन रूहों से बातचीत करते हैं, जहां के मित्रों में हमारा न कोई बिज़नेस का पार्टनर है,न कोई रिलेटिव। किस के पास कितना पैसा है, कितनी बड़ी कोठी है या कार। कोई मतलब नहीं ।इन  संबधों से,और होना भी नहीं चाहिए।

जो कोई अपनी प्रोफाइल में इस संबधी स्टेटस डालता भी है, तो दूसरे को, जो पहले से ही इन लफड़ों से तंग आकर किसी सकून के लिए इस प्लेटफॉर्म पर आया है, इग्नोर करना चाहिए। और उन लोगों से भी बचना चाहिए, जो एक दूसरे के व्यक्तिगत जानने के इच्छुक होते हैं ।

कई बार ऐसा होता है कि जब कभी हम और आप ज़ज़्बात में आकर एक दूसरे के पर्सनली हो कर अपने मोबाइल, शहर, मलाकात वाला सम्पर्क बड़ा कर मिलने की कोशिश करते हैं या मिल भी जाते हैं तो आपको उस मित्र संबधी जो प्यार, जज़्बात, इम्प्रेशन  एक्ससिटमेंट जैसी भावनाएं  पहले अपने दिल-के-दिमाग में बैठा रखी होती हैं, वो तृष्णा जैसी प्यास बुझ जाती हैं, उल्टा वो मित्र उसी स्वभाव चरित्र वाला न निकल पाने के कारण मन अलग से टूट जाता है। और कभी कभार तो मन उस पछचाताप  की अग्नि में ही ध्वस्त हो जाता है, जिन बेवफ़ाइयों और विश्वासों को छोड़कर वो इस पथ पर आया था।

अतः इस शोंक को , जो आपकी नासमझी से रोग बन जाता है को स्वस्थ अवस्था में रखे रहने के लिए इस सोशल मीडिया वाली स्टेज पर सिर्फ प्यार बांटना चाहिए और आशीर्वाद का ही आदान प्रदान करते हुए अपने धार्मिक विचार , देश के प्रेम संबधी होंसले, नई वैज्ञानिक टेक्नलॉजी की जानकारी तथा और सामाजिक व राजनीतिक कार्य प्रणाली की बातचीत करना ही श्रेष्ठ रहता है ।

हां! आप अपने मित्रों से बिना किसी का नाम पता लिये किसी शारीरक, घरेलू ,मेडिकल, सोशल, इत्यादिक समस्याओं तथा सुझावों को भी अपनी चैटिंग का हिस्सा बना सकते हैं। यदि आप में सच्चा प्यार होगा तो कुदरत बगैर अपनी कोशिश के ही आपको इस जन्म या किसी दूसरे सम्पर्कों द्वारा उनसे मिलवायेगी जरूर।

#Seriously

ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡਿਆ ਇਕ ਪਲੇਟਫਾਰਮ ਹੈ

ਸੋਸ਼ਲ ਮੀਡੀਆ ਇਕ ਐਸਾ ਪਲੇਟਫਾਰਮ ਹੈ, ਇੱਥੇ ਸਿਰਫ ਰੂਆਂ ਹੀ ਗੱਲ ਕਰਦਿਆਂ ਹਨ, ਜਿੱਥੇ ਨ ਕੋਈ ਮਿੱਤਰ ਕਿਸੇ ਦਾ ਕੋਈ ਵਿਆਪਰ ਦਾ ਭਾਈਵਾਲ ਹੈ, ਨ ਕੋਈ ਰਿਸ਼ਤੇਦਾਰ, ਕਿਸ ਕੋਲ ਕਿਤਨਾ ਪੈਸਾ ਹੈ, ਕਿਤਨੀ ਵੱਡੀ ਕੋਠੀ ਹੈ ਜਾਂ ਕਾਰ, ਕੋਈ ਵਾਸਤਾ ਨਹੀਂ, ਜੋ ਕੋਈ ਇਨ੍ਹਾਂ ਗੱਲਾਂ ਨੂੰ ਆਪਣੇ ਸਟੇਟਸ ਵਿੱਚ ਪਾਉਂਦਾ ਹੈ, ਜਾਂ ਇਕ ਦੁਜੇ ਨਾਲ ਪਰ੍ਸੰਲੀ ਜਾਣਨ ਦਾ ਇਚੱਛੁਕ ਹੁੰਦਾ ਹੈ, ਪੂਰਤੀ ਵੇਲੇ ਪੱਛਤਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਕਿਉਂ ਆਪਣੀ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਦੀ ਅੱਗ ਬੁਝਾਈ, ਜਿਸ ਨਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਵਰਗਾ ਰੋਚਕ ਪਣ ਨਹੀਂ ਰਿਹਾ। ਇੱਥੇ ਤਾਂ ਸਿਰਫ ਪਿਆਰ ਲੋੜੀਂਦਾ ਹੈ ਅਤੇ ਇਕ ਦੂਜੇ ਲਈ ਅਸੀਸਾਂ। ਪਰਸਪਰ ਦੁਖ-ਸੁਖ ਦਾ ਭਾਈਵਾਲ ਹੀ ਸੁਖੇਲਾ ਹੈ, ਜੋ ਸ਼ਾਇਦ ਅਗਾਂ ਵੀ ਕੰਮ ਆਵੇ।

#Seriously

Thursday, 25 May 2017

आखरी क्षण

एक दिन हमारा पूरा जीवन कुछ क्षण के लिए हमारी आंखों के सामने फिर से झलकेगा,कोशिश है कि वो देखने योग्य हो।

इस फ़िल्म में,हम अपने पूर्व भूल गए, जो कुछ हमने किसी के साथ किया।
वो भूल जाओ कि हमने जो किसी की सांझ में किया और बस अपने आप से कहें कि हमारा पूर्व हमारे पास वापस कभी नहीं आएगा ।
जैसा कि हम करते हैं, आगे बढ़ें और उन चीजों को ढूंढें जो आपको खुशी दे सकती हैं।
अपने जीवन पर ध्यान दें और कभी अपने पूर्व के बारे में।
मत सोचें कि वह ,वह जब वह,वह प्रभु जानता है कि हम कुछ ऐसा करते हैं जो उसे या उसकी प्रशंसा नहीं ले सकते हैं, वो परेशान हो सकता है।
पास बैठे किसी अन्य व्यक्ति के साथ शेयर करें।  जबकि अब हमारा पूर्व वो देख रहा है, या उस पास बैठे व्यक्ति की उपस्थिति यह क्रिया दिखाती है कि हम भूतकाल छोड़ रहे हैं और अपने नए सफर के साथ चल पड़ते हैं।

एक स्वप्न जो देखा, लिख लिया
Seriously

चेतन अवस्था

चेतन अवस्था             
                हमारा शरीर, इसके विभन्न अंग तथा हमारी सोच, ये सभी मस्तिष्क के द्वारा नियंत्रित किये जाते हैं । इसी नियंत्रण को चेतन अवस्था भी कहा गया है । मनुष्य का मस्तिष्क अन्य संसारिक जीवों से अधिक विकसित है क्योंकि यह सोचने,समझने व विचारने की क्षमता भी रखता है । हमारी इसी चेतना, सोचने व विचारने की क्षमता को ही 'मन' कहा जाता है । सोचने की क्षमता के कारण ही हमारा मन सारा दिन विचारों में खोया रहता है । हमारा मन पलक झपकते ही कहीं का कहीं पहुंच जाता है। हमारा मन अधिकतर भविष्य की चिंताओं और भूतकाल की यादों में खोया रहता है । इसका स्वभाव है कि यह किसी एक स्थान (टिकाव) पर नहीं रहता ।
यह जहां हमारा शरीर है, वहाँ ना होकर अपनी अलग दुनिया में जीता है ।
               हमारा मन अधिकतर काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार आदि विकारों से प्रभावित होकर अवगुणों में फंस जाता है । इसलिये हमें अच्छी संगत, अच्छे ज्ञान की बातें अपने मस्तिष्क के जरिये भरनी चाइए जो हमें प्रभु के गुणों के व्ख्यान करने वाली जगहों और ज्ञान वर्धक पुस्तकों से प्राप्त होंगी ।  मन को विकारों से बचाने के लिये घर छोड़ कर कहीं जाने की, गुफाओं, पहाड़ों में रहने की, भिक्षुक बन कर मांग कर खाने की कोई जरूरत नहीं हैं । क्योकि हम जिस गुरु की विचारधारा को मानते हैं वो इन सभी कार्यों की इजाजत नहीं देती ।
                   इस मन की चेतन अवस्था में हमने ये बात अपने संस्कारों जैसे घर गृहस्थी का पालन करते हुए, जो संगत तथा गुरु की ज्ञान की बातें अच्छी पुस्तकों से जाननी है, को अपना कर विकारों के लिये कोई जगह ही नहीं छोड़नी है कि वो इस मन पर काबु कर सकें । तभी हमारा मन भटकना छोड़ एक प्रभु के साथ जुड़ सकेगा ।
                कबीर जी हमें समझाते है कि
         " कहि कबीर मनु मानिआ ।।
            मनु मानिआ तउ हरि जानिआ ।।" 
                  अपनी चेतन अवस्था में मन पर नियंत्रण के लिये उसे खाली समय में या रोजमर्रा के कार्य करते हुए हमें गुरबाणी की शिक्षाओं की यह बात समझानी होगी कि  जो प्रभु अपने अंदर बसा है, हमारे किये कर्मों को देख सुन रहा है, के डर से अपना जीवन ईमानदारी, अच्छी नियत से जीना चाहिये ताकि हर कोई हम पर विशवास कर सके ।
                      फिर हम स्वंय देखेंगे कि हमारे अंदर जो विकार थे वो हवा में उड़न छु हो गए हैं और गुरबाणी से पैदा हुए गुणों के कारण हम सभी से प्रेम करने लग गए हैं । जिससे हमारा मन में सदैव खुशियाँ बनी रहेंगी ।
Amrender Singh Gurmeet Singh Gambhir 

दो_लंमी_नदरि_निहालीऐ

##दो_लंमी_नदरि_निहालीऐ

किसी मनुष्य की देखने वाली तो दो आंखे होती हैं, पर देखती एक-सा हैं।
इनमें भी दो तरह की नज़र है, एक दूर की, दूसरी नज़दीक की।

#सरसरी_नज़र
दूर की नज़र वाली किसी बाहर की रोशनी, बेशक वो सूरज की हो या चांद की, बिजली की हो या आग की,ये सब दूर की यानि बाहर की रोशनी पर निर्भर करता है।

#महीन_नज़र
नज़दीक की नज़र, इस आंख की नज़र अलग है, बेशक इसको देखने के लिए मुख्य रूप में, किसी न किसी रूप में बाहर की रोशनी की जरूरत पड़ती है, पर यह आंख किसी वस्तु को सरसरी नज़र से नहीं देखती। इसकी हर दृष्टि अर्थपूर्ण होती है। इसको कोई चीज़ निरर्थक नहीं दिखती, इसीलिए यह उसके बाहरी रूप को छोड़कर, उसके अंदर के रूप  में झांकती है तथा उसके अपने वस्तु  वेश को बदल कर उसको अर्थ रूप में पलट देती है। इस नज़र को स्वभाविक ही हम "सूक्षम दृष्टि" भी कह सकते हैं। यह तो था #भौतिक_पहलू।

दूसरा पहलू है #आध्यात्मिक,

#लंमी_नदरि (आत्मिक दृष्टि)
ज़रा और गहराई में देखें तो हमें एक तीसरी आंख को देखने के लिए किसी बाहरी रोशनी की जरूरत नहीं पड़ती। यह अपने आप में ही एक रोशनी है तथा यह रोशनी फुट पड़े तो उसकी उसकी ऊपर बताई दोनों की दृष्टि समाप्त हो जाती हैं। इसकी अपनी रोशनी मनुष्य के धुर के अंदर से चमकती है तथा देखा-देखी वस्तु के असल रूप को उखाड़ कर उसको स्वै-स्वरूप में प्रत्यक्ष कर देती हैं । इसकी #आत्मिक_दृष्टि या #ज्योति कहा जाता है।  Cont....

#संकलन एवं #अनुवाद  #GambhirSays

किसी मनुष्य की देखने वाली तो दो आंखे होती हैं, पर देखती एक-सा हैं।
इनमें भी दो तरह की नज़र है, एक दूर की, दूसरी नज़दीक की।

#सरसरी_नज़र
दूर की नज़र वाली किसी बाहर की रोशनी, बेशक वो सूरज की हो या चांद की, बिजली की हो या आग की,ये सब दूर की यानि बाहर की रोशनी पर निर्भर करता है।

#महीन_नज़र
नज़दीक की नज़र, इस आंख की नज़र अलग है, बेशक इसको देखने के लिए मुख्य रूप में, किसी न किसी रूप में बाहर की रोशनी की जरूरत पड़ती है, पर यह आंख किसी वस्तु को सरसरी नज़र से नहीं देखती। इसकी हर दृष्टि अर्थपूर्ण होती है। इसको कोई चीज़ निरर्थक नहीं दिखती, इसीलिए यह उसके बाहरी रूप को छोड़कर, उसके अंदर के रूप  में झांकती है तथा उसके अपने वस्तु  वेश को बदल कर उसको अर्थ रूप में पलट देती है। इस नज़र को स्वभाविक ही हम "सूक्षम दृष्टि" भी कह सकते हैं। यह तो था #भौतिक_पहलू।

दूसरा पहलू है #आध्यात्मिक,

#लंमी_नदरि (आत्मिक दृष्टि)
ज़रा और गहराई में देखें तो हमें एक तीसरी आंख को देखने के लिए किसी बाहरी रोशनी की जरूरत नहीं पड़ती। यह अपने आप में ही एक रोशनी है तथा यह रोशनी फुट पड़े तो उसकी उसकी ऊपर बताई दोनों की दृष्टि समाप्त हो जाती हैं। इसकी अपनी रोशनी मनुष्य के धुर के अंदर से चमकती है तथा देखा-देखी वस्तु के असल रूप को उखाड़ कर उसको स्वै-स्वरूप में प्रत्यक्ष कर देती हैं । इसकी #आत्मिक_दृष्टि या #ज्योति कहा जाता है।  Cont....

#संकलन एवं #अनुवाद  #GambhirSays

Wednesday, 24 May 2017

आध्यात्मिकता व भौतिकता,

आध्यात्मिकता व भौतिकता,
एक व्यक्ति व एक वस्तु।
वस्तु व्यक्ति के लिए, नकि
व्यक्ति वस्तु के लिए।
व्यक्ति, व्यक्ति से प्रेम करे,
और वस्तु का करे उपयोग।
तो समाज होगा स्वस्थ।

पर व्यक्ति व्यक्ति का उपयोग करता है और वस्तु से प्रेम करता है। वस्तु यानि पदार्थ, जिसमें से भौतिकता की गंध आती है।

व्यक्ति व्यक्ति न होकर वस्तु (पदार्थ) बन गया। पैसा सिर चढ़ कर बोल रहा है।

और इधर आध्यात्मिकता में कोई प्रदर्शन नहीं बल्कि दर्शन का महत्व

धर्म का लक्ष्य मोक्ष यानि मुक्ति,पदार्थ तो कदापि नहीं।

जीवन का लक्ष्य, तत्व को जानने की इच्छा (जिज्ञासा) तत्व  को परमात्मा कहना पूर्णविराम नहीं। तत्व को और जानने की प्यास के चलते ही जीवन है।

आज इंसान परमात्मा से धन ही मांगता है यानि धर्म का लक्ष्य पदार्थ, मोक्ष नहीं।
एक समय था, जब लोग व्यापार में धर्म को आगे रखते थे, अब धर्म व्यापार का रूप ले रहा है। चारों तरफ  वाहवाही और दिखावे की प्रतियोगिता है। समाज में कोई इस समस्या को जड़ से उखाड़ सकता है, तो वो है "आध्यात्मिकता"  जो समाज को जोड़ती है, और भौतिकता इंसान को समाज से तोड़ती है।
संकलन