आम तौर पर मनुष्य की धारणा रहती है कि कम से कम धार्मिक पाठ पूजा करते हुए अपने तन व उस स्थान को शुद्ध रखना चाहिए कि इसका प्रभाव हमारे कर्मों पर न पड़े।
किन्तु गुरु नानक जी के कहे को जाने, तो अशुद्धि हमारे मन में है तो शरीर को साफ़ करने के लिए यह धारणा को पालना व्यर्थ है, बल्कि शरीर के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है।
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