Monday, 25 May 2020

अपना अपना सुख

कुछ लोगों का क्या है, अकेला रहना पसंद करते हैं, कुछ किसी बंधन में खुश हैं। जरूरी नहीं कि यह उनकी आदतों का शूमार हैं कि जो अपने साथ ढल रहा है उसी को अपनी मजबूरी व उसकी मर्जी समझ अपना लिया। और अपनी उभरती हुई इच्छाओं का गला घोंट बैठे। या वो इच्छाएं पनप ही न पाईं।

जिसने जिंदगी भर अकेले रह आजादी देखी, उसे परिवार का सुख क्या होता है, पता नहीं होता है। जो सारी उम्र परिवार की जिम्मेवारियों में फंसे रहे, उसे अकेले रह जंगल पहाड़ों में घूमने का सुख क्या होता है, उसकी जानकारी नहीं। 

पर दोनों में से कोई पढ़ लिख कर अपने मिले ज्ञान से कल्पना में ही सही दूसरे के सुख का अंदाजा लगता है तो फिर ही उसके मन में उस को पाने या एक झलक भर की इच्छा जागृत होती है। यदि जिंदगी के समय रहते उन दोनों में से किसी एक को भी मौका मिला दूसरे के सुख पाने का तो वो या तो उतावला पन दिखलाता है या डर व घबराहट से जल्द बाजी नहीं दिखलाता। 

मैं फिलहाल इस विषय में उन व्यक्तियों की श्रमता जैसे आर्थिकता व समय की उपलब्धता को दूर रखता हूँ। वो व्यक्ति उन इच्छाओं को पाकर भी अधिक समय तक उस विपरीत जीवन को सुख से अपना नहीं पाएगा। 

रुक रुक कर बीच बीच में वो इस नए सुख को पुराने वाले सुख की कसौटी पर तौलने की कोशिश करेगा क्योंकि वो व्यक्ति अपने पुराने सुख में अपने अधिक दिन गुजार चुका होता है। जितना भी कह लो वो मजबूर अवश्य होगा पर अपनी असल आजादी वापिस उसी दिशा में दिखेगी जिसका वह अभ्यस्त है।

#Seriously

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