अधेड़ उम्र में देखा जाता है कि शरीर के बुढ़ापे की ओर बढ़ते कदम से इंद्रियां शिथिल हो जाती हैं। शिथिल इंद्रियां शक्ति खो देती हैं। इंद्रियां शिथिल हो जाने के कारण दर्द करने लगती हैं, तो मन का ध्यान पूजा-आराधना की ओर नहीं जा पाता।
इसलिये यह धारणा गलत निकलती है कि खेल-कूद, खान-पान, मौज-मस्ती,काम-काजी जीवन के बाद बहुत समय है नाम-जाप करने का, जिससे उस शक्ति की प्रशंसा हित इस जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति-मार्ग मिले। पर यह तब संभव हो पाए, जब शरीर साथ दे, पर इस निर्बल से ऐसा मुमकिन नहीं।
यदि किसी को मेरी इस बात पर विश्वास हो, तो "वे क्षण जो आत्म-ध्यान में व्यतीत हो और शरीर की स्मृति व शक्ति न जाए, वही क्षण मनुष्य को जीवन की ऊंचाइयों भरे वास्तविक लक्ष्य की तरफ ले जाते हैं।"
#Seriously
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