अपने की मानसिक वेदना हो, मसोस कर रह जाता है मन।
अपने से छोटा कोई खिन्न हो जाए, भारी पड़ जाता है मन।
अपने से छोटा अयोग्य अव्वल हो, मारना पड़ता है मन।
अपने में छोटा अयोग्य 'अपना' हो, हर्षित हो जाता है मन।
अपने से छोटा अशिक्षत सफल हो जाए, टटोलता है मन।
अपने घर लोटते ही पत्नी मुस्कुराए,हरा-भरा हो जाता है मन।
अपना कोई किसी बात पर धोखा दे जाए, उतर जाता है मन।
अपने सहपाठी को याद कर, अनुभूति से घर कर जाता है मन।
अपनी सहपाठिन को याद कर अनुभूति में गड़ जाता है मन।
अपना सौंदर्य किसी कि आर्कष्ट करे, आखें चुराता है मन।
अपनी विरक्ति से घ्रणा करे कोई, खट्टा-सा हो जाता है मन।
अपनी मित्र से अनुभूति जता ना सके, मन में रह जाता है मन।
अपने से गुब्बार निकाल,उद्धेग दूर कर भड़ास निकालता है मन।
अपने के प्रति दुरभावना छिपी हो, ख़ुद को चोर कहलाता है मन।
अपना कोई साहस तोड़े,दिल छोटा करे, कच्चा हो जाता है मन।
अपना कहीं मन न लगे,आसक्ति उत्पन हो, उखड़ जाता है मन।
अपनी इस पोस्ट पर 'लाइक' ना करें, 'गंभीर'-का रह जाता है मन।
Tuesday, 23 May 2017
मन
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